Thursday, 20 July 2017

श्रीखण्ड़ कैलाश महायात्रा

हाँजी साइकिल वाले भाई साहब
आज कल सन्नाटा छाया हुआ है ब्लॉग पर
न कोई नयी पोस्ट न फेसबुक न इंस्टा
कहाँ खो गए हो, कैसे चलेगा ऐसे
और लगाम लगाएगा कौन, इस दुनिया की होड़ पर

मेरे रहनुमा आज मेरे सारे बहाने ख़त्म हो गए
सोच रहा था करियर बना लूँ पहले
फिर करता मैं, पोस्ट ब्लॉग पर
अपने संघर्ष की

हाहाहा बेटा तू फस गया ना
इस भवसागर में

जी हाँजी अब तो फस ही गया समझो
और अब आप ही बाहर निकालो मुझे इस भव सागर से
कब तक गोते ही खाऊँगा मेरे रहनुमा
रेहम कर थोड़ा
कोई रास्ता बता
क्यों जले पर नमक रगड़ रहा है

अब तुझे यात्रा पर चले जाना चाहिए
सठिया गया है तू

पर रहनुमा किधर जाऊँ
कहाँ का प्रोग्राम बनाऊँ
ये सठियापना कैसे हटाऊँ
किस ठौर डेरा जमाऊँ

चल सुन फिर तू
एक कथा सुनाता हूँ
ज़ेहन की सारी धूल हटाता हूँ
ध्यान से सुन विस्तार में समझाता हूँ

भोलेनाथ के भोलेपन का लाभ जिसने था उठाया
वही भस्म हुआ स्वशक्ति से, भस्मासुर कहलाया

ये कथा पौराणिक समय की जब
असुर एक तपस्या को आया
कर घनघोर तप कहीं तब
भोलेनाथ को प्रसन्न कर पाया

भोलेनाथ प्रसन्न हुए, दिए दर्शन भक्त को
बोले वत्स माँगों वर तुम, जो भी तेरा मन हो
असुर बोला, वर भोलेनाथ मैं अमरता का लूँगा
कालचक्र से मुक्त हो जग में अमर नाम करूँगा

बोले भोलेनाथ वत्स वर अमरता का न दे सकता मैं
कुछ और माँगो वर, जिसे अभी पूरा कर सकता मैं
फिर दो वर मुझे
कि जिसके सिर पर हाथ मैं रखूँ वो भस्म हो जाए
तथास्तु बोल भोलेनाथ भक्त कि ये इच्छा पूरी कर पाए

असुर बुद्धि ठनकी सोचा
सबसे पहले भस्म भोलेनाथ को कर, पार्वती को हर लूँगा
ना रहेंगे भोलेनाथ, कोई और ऐसा वर फिर किससे लेगा
दौड़ा वो भोलेनाथ के पीछे उनको भस्म करने को
भोलेनाथ भी भागे प्राण रक्षा करने को

असुर के इस कृत्य को देख पार्वती माँ थीं रोई
नैन सरोवर बना उन आंसूओं से जहाँ ये घटना होई
शिव छिपे एक गुफा में भस्मासुर से बचने को
उधर धरा विष्णु जी ने मोहनी अवतार शिव रक्षा करने को

देख मोहिनी को, भस्मासुर मोहित था हुआ
सब भुला एक पल में, उसे पाने को आतुर हुआ
शर्त रखी मोहिनी ने कि नृत्य कला में मुझे रिझाओ
जैसा नृत्य करती हूँ मैं वैसा तुम भी करके दिखलाओ

मोहिनी के रूप रंग में था असुर छला गया
जैसे मोह-माया में ये संसार छला गया
जैसी मुद्रा में होती मोहनी सबकी नक़ल करता गया
जब भस्मासुर नृत्य में पूर्णरूप से रम था गया
रखा मोहिनी ने अपने सिर पर हाथ और भस्मासुर भस्म था हुआ
ठीक वैसे ही अब तो इस कलयुग में भी सबका बेड़ा गर्क है हुआ

जब बोले देव शिव से, कैसे मोहिनी के हाथों भस्मासुर भस्म हुआ
आईये बाहर गुफा से आपके अनोखे वर का अंत हुआ
पर शिव भूले रास्ता गुफा से बाहर आने का
और शक्ति सवरूप प्रकट हुए एक चोटी पर
जो कहलाया श्रीखण्ड़, अदभुत तीर्थ एक इस ज़माने का


मेरे रहनुमा तुमने मेरे मुँह की बात छीन ली
जाना तो मैं भी बड़े टेम से चाहता था यहाँ
पर सुना है यात्रा लम्बी है बहुत
और चढाई का भी अंत ना है वहाँ
सुना है श्रीखण्ड़ में शरीर ही खंड-खंड हो जाता है
और इतनी ऊंचाई है कि साँस भी न आती वहाँ

हाहाहा तू मसखरी बहुत करता है साइकिल
जाने वाले के लिए क्या मुश्किल भला
और चढाई उतराई क्या है
आँखों का धोखा भला

जी ठीक है फिर
गुरूजी भी जा रहे हैं
उन्हीं के साथ हो लेता भला
और साथ हैं साथी जो
भरोसे के बन्दे सब नेक हैं भला
मुझे मरने ना देंगें ये मुझे पता

वाह बेटा क्या खूब कहा
नेकी भरोसा इस ज़माने में कहाँ मिलता है भला

ऐ मेरे रहनुमा कभी इन लोगों से भी मिलना भला
गुरूजी और मुझे मिला कर 
इस यात्रा पर कुल हम पांच हैं भला


गुरूजी को तो संसार है जानता उनके बारे में क्या लिखूँ भला
फिर मैं खुद हूँ अपने मुँह मियाँ मिट्टठू क्या बनूँ  भला
फिर है हमारा सिरमौरी नौजवान 
नाम विवेक ठाकुर भला
समझो जैसे है एक दम गाऊ
पहाड़ी मित्र है दम एक दम पक्का भला



एक है चौधरी अमनदीप
सुलझा हुआ शख़्स भला
जीवन की ऐसी समझ और मज़ाकिया
बावा हर कुछ भला


और एक है सबका प्यारा रविंदर
पाल नटखट भला
जो भेड़ों को देख कर ख़ुशनुमाया ऐसे
मानों उसकी ही हों भला

वाह साइकिल वाले भाई साहब
बातों-बातों में सबका परिचय करवाया भला
पाँच तो पांडव भी थे
यही रास्ता उन्होंने भी आज़माया भला
अब यात्रा का भी कुछ सुनाओ भला


जी चले हम पाँचों चण्डीगढ़ से
7 जुलाई रात आठ बजे भोले की कृपा से
सुबह रामपुर बुशहर पहुंचे
खाये वहाँ पेट भर पराँठे
फिर एक टैक्सी वाले से चौदह सौ में
गांव जाओं तक का सौदा हुआ
जो रामपुर बुशहर से पच्चपन किलोमीटर दूर है बसा
रामपुर है शिमला ज़िले में
जाओं कुल्लू में हुआ
सतलुज जो बहती बीच दोनों के
जिसने ये बँटवारा है किया
नदियाँ तो इस ज़माने में बस सीमाएँ ही रह गयीं हैं

चण्डीगढ़ से चले हम रात आठ बजे
और सुबह आठ बजे हमने जाओं से यात्रा का श्रीगणेश था किया
सनस्क्रीन लगा चेहरे पर भोलेनाथ का गुणगान था किया
बेआरामी में इस यात्रा का आगाज़ था किया


जाओं से निकलते ही लँगर ही लँगर लगे हैं
और रास्ते के दोनों तरफ सेब के बाग़ फूले फलें हैं
और उनके आगे असली यात्रा पथ शुरू है होता
जाओं से बराहटी नाले तक तो मानों गांव महसूस होता


बराहटी नाले पर एक बीस मीटर लम्बा लकड़ी का पुल है
पुल के साथ ही बाबाओं का झुरमुट है
साथ ही प्राचीन मंदिर है
उसके बाद यात्रा का असली आनंद है

यहाँ से चढ़ाई शुरू है होती
अगर पानी की बोतल हो खाली तो
यहीं बराहटी नाले से फुल होती
आगे पानी का कोई स्त्रोत ना है

ये पहाड़ है डण्डा धार
मानों खड़े डण्डे कि चढाई 
ऊपर तो देखो 
बस चढाई ही चढाई 
चढाई है आगे अब चढ़ते चलो
बस चढ़ते चलो
रुक कर थोड़ा दम ले लो मगर
बस चढ़ते चलो चढ़ते चलो


इसके बाद पहला टेंट स्थान है जो आता
उसे कहते हैं थटीबी
सुन्दर बहुत है मन को भाता
उसके बाद है तीखी चढ़ाई
यहाँ हमने भाई पी थी चाय
उसके बाद सीधा थाचडू में ब्रेक लगाई



थाचडू जो पहुंचे तो बारिश शुरू हुई
रुके यहाँ घंटा भर जब तक ना थमीं
शाम चार बजे यहाँ से रुखसत हुए
अगला पड़ाव कालीघाटी
जिसकी चोटी पर काली माँ का मंदिर दिखे


काली घाटी जहाँ से शुरू होती है वहाँ डंडा धार ख़त्म होती है | श्रीखण्ड़ यात्रा पर सबसे पहली परीक्षा ये डंडा धार ही है | डंडा धार बराहटी से शुरू होती है और इस धार का अंत काली घाटी की उतराई शुरू होते ही होता है | ये चढ़ाई थोड़ी मुश्किल है और बहुत सारे लोग इस चढ़ाई को चढ़ते-चढ़ते बीच में थाचडू नामक स्थान पर, जहाँ टेंट आदि की सुविधा है में हथियार डाल देते हैं और पहले दिन का सुखद अंत करते हैं | खैर हम सब नौजवान थे तो बारिश रुकते ही थाचडू से निकल पड़े, तब शाम के चार बज रहे थे | थाचडू से चढाई चढ़ कर हम काली घाटी की चोटी पर पहुँचे | मौसम साफ़ नहीं था, हल्की बारिश हो रही थी और बदल छाए थे तो यहाँ से हम श्रीखण्ड़ महादेव के दर्शन न कर सके | जी इस चोटी से श्रीखण्ड़ महादेव दिखते हैं | चोटी पर काली माँ का मंदिर है और साथ ही रुकने एवं खाने-पीने की पूरी सुविधा है, बहुत सारे टेंट लगे हैं | यहाँ हमें एक गुजरती परिवार मिला जो कुछ दिनों से इसी चोटी पर डेरा जमाए था | वे बस दूर से ही श्रीखण्ड़ दर्शन कर खुश थे और थोड़ी बातचीत करने पर पता चला की वे ऊपर श्रीखण्ड़ पर चढ़ाने के लिए खूब सारी पूजा सामग्री भी लाए हैं | हमारी हिम्मत देख उनको यकीन हो गया था कि उनका अधूरा कार्य अब हमारी टीम ही पूरा कर सकती थी | उनकी पूजा सामग्री विवेक जी ने अपने झोले में रख ली जिसका अंदाज़न वजन एक किलो तो रहा ही होगा | जिस ऊंचाई पर लोग (ये स्थान भी 3800 m  कि ऊंचाई पर है) अपना आपा खो देते हैं उस ऊंचाई से परोपकार शुरू कर श्रीखण्ड़ तक पहुँचाना, ऐसा कार्य तो हमारे विवेक जी जैसा धार्मिक व्यक्ति ही कर सकता है |

अलविदा कह उनको हम रुखसत थे हुए
उतरे काली घाटी
और समझो की उतारते ही गए
शंका एक तभी मेरे दिल में थी आयी
उतर तो गया तू लौटते समय कैसे चढ़ेगा भाई


काली घाटी के नीचे है भीम तलाई
यहाँ है लगा लँगर पेट भर खाओ मेरे भाई
खाना रात का हमने यहीं खाया
फिर थोड़ा आगे जाने का मन बनाया
और कुछ और आगे जा कर हम रुक गए
रात रुकने मात्र का सौदा टेंट वाले से सात सौ में कर गए
इस तरह हम अपने पहले दिन का सफर 
भीम तलाई में ख़त्म कर गए

सुबह उठे जल्दी
साढ़े पाँच बजे ही चल पड़े
और पहुंचे अगले पड़ाव
जिसे कहते हैं कुंशा सभी
ये जगह है बहुत सुन्दर
देखते ही रह गए सभी



यहाँ गुरूजी को मिले उनके दोस्त चीकू जी
जो आये हैं हिमालय की सफाई को जी
ये लोग वो हैं जो पहाड़ों को सवच्छ हैं बनाते
आपके हमारे द्वारा फैलाया कचरा उठाते
(हीलिंग हिमालया एक NGO है जो पहाड़ों को सवच्छ रखने का काम करती है )



कुंशा से चले तो भीम द्वार पहुँचे
यहाँ हम सुबह के नौ बजे पहुँचे
और पता चला की अब आगे रुकने की कोई और जगह नहीं है
पार्वती बाग़ में बस हैं फौजी और कोई नहीं है
और वो भी सुबह दस बजे के बाद किसी को ऊपर ना जाने देंगे
अरे हम तो वैसे ही हैं थके हुए और आज के लग गए यहीं डेरे
एक टेंट वाले के यहाँ रुकना हुआ
कुछ सोए कुछ उठे
कुछ घूमना फिरना हुआ


भीमद्वार के ऊपर की और है फूलों की घाटी
मिलते यहाँ है फूल भाँती भाँती
यहाँ हमने कुछ लम्हे बिताए
कुछ चित्र खींचे 
कुछ ध्यान लगा आए




अगली सुबह या रात ही कहूँ 
हम चले अँधेरे में तब दो थे बजे
पराँठे पाँच टेंट वाले से पैक थे करवाए
और ज़ोरों शोरों से जैकारे लगाए
और हम चल दिए कैलाश की ओर


रात दो बजे हम भीम द्वार से श्रीखंड महादेव कि ओर चल पड़े | हमने अपने जल्दी चलने कि सूचना पहले से ही टेंट वाले को देदी थी और रास्ते के लिए उससे पाँच परांठे भी पैक करवा लिए थे | हमने अपना गैर ज़रूरी सामान भी यहीं टेंट वाले के पास रख दिया और बस जरुरत भर की चीज़ें लेकर श्रीखण्ड़ महादेव जी के दर्शनों को निकल पड़े | इतनी जल्दी चलने से हमें ये फायदा हुआ कि रास्ते में हमें भक्तों का ट्रैफिक कम मिला और हमारे पास दिन में वापिस लौट आने के लिए काफी समय था | रात के समय गुरुपूर्णिमा के चाँद में पार्वती बाग़ का नज़ारा देखने लायक था |    

वाह भाई वाह क्या नज़ारा है दिखता
धरती का नहीं ये तो स्वर्ग सा है लगता
चाँदनी चाँद की दूधिया सब कर देती
लगता है ऐसे
कण-कण चाँदी है लेपी
और हम बढ़ते-बढ़ते ऊपर चढ़ते जाते
देखते अग्रणियों को जो जुगनुओं से भाते
या कभी देखते बायीं ओर जहाँ ये दो झरनों का संगम
या देखते चाँदनी में चमकते फूलों की चादर
ये आलोकिक सा नज़ारा पार्वती बाग़ है कहलाता
चमकती बूटी बूटी हर फूल मुस्काता 
चाँद आसमान में कभी बादल के पीछे है छुपता
कभी दिखाता है रास्ता कभी आँख मिचौनी है करता
मज़ा चांदनी रात का और इन नज़ारों का लेते
चढ़ते-चढ़ते हम पार्वती बाग़ पहुँचे

खैर कल की सारी जानकारी गलत निकली
यहाँ हैं तम्बू खूब रहने की जगह भी
पार्वती बाग़ के आगे कोई तम्बू नहीं है
ये अंतिम स्थल जहाँ रुकने की जगह है

आस-पास के क्षेत्रों से आए स्थानीय भक्त अपनी पहले दिन की यात्रा यहीं पार्वती बाग़ में ख़त्म करते हैं | सुबह जल्दी उठ कर आगे पथरीली घाटी पार कर नैन सरोवर के अर्ध बर्फ वाले पानी में नहाते हैं और दुर्गम पथ को आसानी से पार करते हुए श्रीखण्ड़ महादेव के दर्शन कर उसी दिन वापिस लौट आते हैं | यात्रा के दौरान इन भक्तों को पूरी इज्जत के साथ रास्ता दें क्यूँकि बहुत सारे तो नंगे पाओं ही इस यात्रा को पूरा करते हैं | श्रीखण्ड़ महादेव की यात्रा का रास्ता बहुत ही संकरा और दुर्गम है | सामने से आने वाले भक्तों को रुक कर पास देना पड़ता है | कृपया संयम बनाए रखें आपकी जरा सी जल्दबाजी बहुत नुक्सान दायक हो सकती है | इस यात्रा में खच्चरों की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है | सारा सामान नेपाली अपनी पीठ पर ढ़ोते हैं, तभी जो पेप्सी की बोतल तीस रूपए की आती है वो ऊपर सौ की मिलती है |

पार्वती बाग़ के बाद है असली परीक्षा
पत्थर ही पत्थर हैं ना है रास्ता दिखता
रात भी है ये चाँदनी मतवाली
कभी घुप अँधेरा कभी है उजाली

चढ़ता-चढ़ता मैं सबसे आगे था निकला
पहुँचा नैन सरोवर तक, ना साथी कोई दिखता
फिर दूर से जानी-पहचानी आवाज़ आयी
ओ पण्डत ! किधर गया तू मेरे भाई

भाई विवेक मैं तो ऊपर चढ़ गया हूँ
जैसे चल रहे थे सब लोग मैं भी वैसे ही चढ़ गया हूँ
तुम लोग चालाक निकले शॉर्टकट हो बनाते
मैं चढ़ गया खड़ा पहाड़ तुम ग्लेशियर चढ़ कर आते

पर तुम्हारे शॉर्टकट का एक नुक्सान निकला
मैं भर लाया नैन सरोवर से पानी
जिसको बाईपास कर तुम्हारा काफिला निकला
जी ये वही है नैन सरोवर जहाँ आँसू हैं इकठ्ठा



सुबह साढ़े पाँच बजे का समय होगा | मैंने नैन सरोवर के बाहर जूते उतारे और बोतल लेकर आगे बढ़ा | यहाँ एक मंदिर बना है और मंदिर से सटा हुआ आगे जाने का द्वार है | शुरुआत में तो ठोस बर्फ़ है लेकिन जैसे जैसे आप पानी के करीब जाते हैं वैसे-वैसे आपको ठण्ड का एहसास होने लगता है | पानी भरते समय बर्फ़ पर ही रहें पानी में पैर डालने की गल्ती न करें, पैर घंटे भर के लिए सुन्न हो जायेंगे | पानी भरते हुए जब मुंडी घुमा कर देखा, इसी सरोवर के किनारे पर भक्त स्नान कर रहे थे | स्नान करने का मन तो बहुत हुआ पर हिम्मत नहीं कर पाया | एक तो सब साथी ग्लेशियर से होते हुए नैन सरोवर आए बिना सीधा ऊपर पहुँच चुके थे और अकेला होने के कारण मैं सोच रहा था कि स्नान के चक्कर में जम ही गया तो निकालेगा कौन ? 
पानी का आखरी स्त्रोत ये नैन सरोवर ही है | आप जाएँ तो यहाँ भरपूर पानी पिएं और अपनी बोतल फुल भरके ही आगे जाएँ | इसके बाद पानी नहीं मिलेगा और चढाई बहुत कठिन है, इसलिए यहाँ से पानी का इंतज़ाम करके ही चलें |
खैर मैंने अपनी बोतल भरी और वापिस आ गया | अगली बार जाऊँगा तो जरूर डुबकी लगा कर आऊँगा, हे भोलेनाथ इस बार मुझे माफ़ करना......     


नैन सरोवर से है बर्फीली चढाई
पहले खड़ा ग्लेशियर फिर तीखी चट्टानें भाई
पत्थर ही पत्थर और उससे बड़े पत्थर
फिर बर्फ की चादर और उसके बाद और बड़े पत्थर

अब जिस जगह हूँ उसे कहते भीम बही भाई
यहाँ भीम महाराज ने हिसाब रखा भाई
चट्टानों में छिद्र हैं जहां दर्ज हिसाब उनका
ये वादी उन्हीं की ये रास्ता भी उनका

अंत में हैं कुछ सलीके से लगीं सीढ़ियां
इतना सलीका की मिस्त्री का काम लगे
कहते की पांडव सवर्ग का राह गढ़ने चले
पर पूरा ना कर सके



एक बर्फ का ग्लेशियर पार किया
फिर चट्टानों के बीच से जब निकला
वाह भोलेनाथ का प्रचण्ड सवरूप दिखला
खंड-खंड अखण्ड ये श्रीखण्ड़ भाई
शिव रूप प्रचण्ड ये श्रीखण्ड़ भाई

दर्शन मात्र से थकान चली गई और
परिक्रमा करने की ऊर्जा आ गई
चले नंगे पाओं बर्फ पर परिक्रमा को
मिला ना ऐसा सकूं कभी मन को

अंग-अंग जैसे ज्वाला प्रचण्ड
ज्वाला स्वरूप शिव 
लपट सा दिखता श्रीखण्ड़
शीश नवाया माथा टेका 
और गर्दन घुमा कर 
पूरा नज़ारा भी देखा 


पीछे श्रीखण्ड़ के जो चोटी है दिखती
कहते उसे कार्तिकेय
क्या मनोरम है लगती
सामने माँ पार्वती सहित गणेश विराजे
पहुँच कर यहाँ भक्त 
क्या ज़ोर से जैकारे लगाते


खड़ा आज तुम्हारे प्रांगण में
हर दिशा में देखता हूँ
इस धरती को देखता हूँ
आकाश देखता हूँ
और देखता हूँ बीच में फसे बदल हैं जितने
भाई कितना उपर आ गया मैं 
सब गौण हैं लगते

कुछ देर बाद सब साथी भी आए 
मिलके हम सबने जय भोले के जैकारे लगाए
फिर गुरूजी ने सुदूर पहाड़ों में 
किन्नर कैलाश के दर्शन करवाए


वह देख रहा दूर से
सब पर निगाह पूरी रखता 
वही खिलाता है फूल 
उसी की मर्ज़ी से पत्ता हिलता
बैठा है वो अंदर 
या जा बसा पहाड़ में 
खोजना ही फ़र्ज़ हमारा 
खोजें जितना खोजें 
पाएँ अपने आप में 


बादलों के बीच उभरे पहाड़
जैसे नोक कोई चीरे 
बादलों की चादर को लगातार
नज़ारा ये नज़ारा देखते ही है बनता   
ऊपर से ये जहान देखो कितना मनोरम है लगता

कर प्रणाम कैलाशों को मैं बैठ गया हूँ 
आलोकिक सौंदर्य से प्रफुलित हुआ, बैठ गया हूँ 
बैठ गया हूँ शांति से तुम्हारे प्रांगण में


मैदान लाँघ आया हूँ
गाँव पीछे छोड़ आया हूँ
पर्वत चढ़ आया हूँ
झरने, बर्फ़ और पत्थर
सब पार कर आया हूँ
अब थक कर बैठ गया हूँ
तुम्हारे प्रांगण में
जो माँगने आया था
वो भूल चुका हूँ
जिसके मिलने कि कोई आशा न थी
वो पा चुका हूँ
अब थक कर बैठ गया हूँ
तुम्हारे प्रांगण में
सुना था यहाँ से सीढ़ी स्वर्ग को जाती है
फिर वही सीढ़ी स्वर्ग भी तो धरा पर खींच लाती है
मैंने जो भी देखा वो तुम्हीं ने दिखलाया
भेद जो भी खोला तुम्हीं ने बतलाया
और अब मैं थक कर बैठ गया हूँ
तुम्हारे प्रांगण में
मुझे तुमसे न कोई शिकायत
न है मेरी कोई ख़्वाहिश
बस ऐसे ही थका कर बैठा लिया करना
तुम मुझे अपने प्रांगण में.....


हम सबने श्रीखण्ड़ के दर्शन किए और विवेक जी के झोले में रखी गुजरती परिवार की पूजा सामग्री विधिवत रूप से भोलेनाथ जी को अर्पित की | कुछ चित्र खींचे, कुछ नज़ारों का आनंद लिया |  मौसम का बदलता मिज़ाज देख नीचे उतरना ही ठीक समझा |

कुछ ही देर में 
बादल छाने लगे
उमड़ घुमड़ कर आने लगे 
नीला आसमान सफ़ेद हो गया
मानो भोलेनाथ ने जटाएं बिखेर दी हो
चढ़ता दिन ढलती शाम सा हो गया 
सुनहरी धूप की जगह 
धुंध ने ले ली
और मखमली झोंकों की जगह सर्द हवा ने ले ली
चल भाई चल अब लौट चलें
बारिश आने ही वाली है बस
चलो अब लौट चलें


दस बजे चले हम ऊपर श्रीखण्ड़ से
बर्फ में गिरते फिसलते और सम्भलते
उतरते जाते हम पहाड़ के कंधे से
कुछ घंटा भर उतरने के बाद 
एक चट्टान पर सब चढ़ गए 
आस-पास बर्फ़ ही बर्फ़
थोड़ी थकान दूर करने को रुक गए
और खाए हमने वो टेंट वाले से लाए पराँठे
ठन्डे जैसे जमें हुए हों पर स्वाद में निराले
ये भोजन काफी समय तक यादगार रहेगा
और ये नज़ारा तो ताउम्र याद रहेगा 


उतरते-उतरते हम नैन सरोवर तक आ गए
पानी पिया सबने, अपनी प्यास भुझा गए
बादाम बिस्कुट का भोग भी लगाया 
थोड़ा आराम किया थोड़ा सुस्ताया

नैंसरोवर से चले नीचे को 
तो बारिश थी आयी 
निकालो सब रेनकोट
अपना-अपना बचाव करो भाई

नैंसरोवर से पार्वती बाग़ 
पत्थर ही पत्थर 
ऊपर से ये बारिश 
अब फिसलन ही फिसलन
धुंध घनी इतनी 
रास्ते का निशान भी नहीं दिखता 
ऐसी स्तिथि में तो बस अंदाज़ा चलता 

बचते बचाते हम पार्वती बाग़ पहुँचे
यहाँ से सीधा नीचे भीम द्वार पहुँचे 
वहाँ उसी टेंट वाले के पास मैगी खाई 
और फिर चल पड़े और नीचे को 
अभी तो बस चार बजे हैं मेरे भाई 


बारिश आती जाती रही 
और हम उतरते रहे
उतरते उतरते हम कुंशा पहुँचे
शाम भी धुंधली सी थी 
जब हम कुंशा पहुँचे 
बस आज का डेरा यहीं जम गया 


सुबह उठे जल्दी हम 
फिर उतरने लगे नीचे 
लेकिन एक सोच जो बार-बार ध्यान खींचे
कैसे चढ़ेगा काली घाटी कि चढ़ाई 
जिसको बड़े मज़े से उतर आया था मेरे भाई


कुंशा से हम भीम तलाई पहुँचे 
यहाँ पिया पानी
और सब ऊपर को देखें 
सामने है काली घाटी कि चढ़ाई 
देख कर ही जिसको साँस फूल गई मेरे भाई 


बारिश ने भी अभी तक था डेरा जमाया
और काली घाटी का हर पत्थर 
फिसलन कि माया 
धीरे-धीरे हम बस ऊपर चढ़ते जाते
कुछ देर रुकते साँस लेते 
और फिर चढ़ते जाते 

पचास मिनट में हम ऊपर पहुँचे
हमको ही पता ये पचास मिनट कैसे बीते
अब तो बस उतराई ही है भाई 
उतराई उतराई जाओं तक उतराई

ग्यारह बजे हम थाचडू पहुँचे 
रुके नहीं यहाँ 
सीधा नीचे थटीबी पहुँचे 
जहाँ जाती बार पी थी
वहीँ आती बार भी पी चाय
खाये बादाम और भुने चने मेरे भाई

यहाँ से चले तो सीधा बराहटी रुके 
सीधा नाले में नहाने को घुसे 
यहाँ ठन्डे पानी में डुबकी लगाई 
और यात्रा कि सारी थकान मिटाई

अब चले बराहटी से तो सीधा जाओं में रुके 
लँगर में खाए परांठे खीर चाय भी पिए  
फिर रामपुर के लिए एक गाड़ी बुक कि 
आए थे जितने में ये भी उतने में ही कि 
और शाम 5  बजे हम रामपुर पहुँचे 

सीधा गए बसस्टैंड 
देखा बस लगी है 
सीधा चण्डीगढ़ कि टिकट कटवाई
और रात दो बजे चण्डीगढ़ पहुँचे मेरे भाई 

उसके बाद तो सब सो गए 
सो सो के सबने थकान मिटाई 
अगले दिन शाम तक 
सबको कहीं होश थी आयी 

कृपा भोले नाथ कि यात्रा सफल रही 
हम सबको ही भोले ने दर्शन दिए जो
सब कुशल मंगल पहुँचे इतनी कृपा की
माफ़ करना गर कोई त्रुटि हुई हो 
करना कृपा हमपर मुर्ख अज्ञानी समझ कर

मेरे रहनुमा इस तरह ये यात्रा पूर्ण हुई 
और बहुत कुछ इस यात्रा से मैंने सीखा भला 
बहुत दिनों बाद इतना आनंद आया 
अगली बार भी ऐसा ही कोई स्थान सुझाना भला

हाँ साइकिल वाले भाई क्या खूब कही 
यात्रा ऐसी की शब्दों से ही करवा दी भला
चल चलता हूँ अब मैं, काम बहुत है 
अगली यात्रा पर तुझे मिलता मैं भला 

इस यात्रा के कुछ पहलू

श्रीखण्ड़ महादेव समुद्रतल से लगभग 5100 m मीटर की ऊंचाई पर है | इस यात्रा को अपनी पहली यात्रा कभी न बनाएँ और भरोसेमंद लोगों के साथ ही जाएँ | इस यात्रा के दौरान AMS का खतरा है | AMS की पूरी जानकारी और दवाई जरूर लेकर जाएँ | शारीरिक शक्ति से आप दो कदम ज्यादा चल लोगे, मानसिक शक्ति से आप चार कदम ज्यादा चल लोगे, पर यहाँ आपको आपकी सिर्फ और सिर्फ इच्छा शक्ति ही लेकर जाएगी | भगवान और अपने आप पर भरोसा रखें और चलते रहें |
इस यात्रा के दौरान बहुत बार जमें हुए झरने, ग्लेशियर और बर्फ़ पर चलना होता है | सावधानी से चलें और बर्फ़ पर पहले एड़ी से ठोक कर जगह बनाएँ फिर वज़न डालें | बर्फ़ पर चढ़ने की बजाए उतरने में ज्यादा मुश्किल होती है, सावधान रहें और एड़ी वाला फार्मूला याद रखें | 

ट्रेकिंग पोल या लकड़ी की छड़ी बहुत जरुरी है, ज़रूर लेकर जाएँ या लौट कर आते हुए यात्रियों से माँग लें | ये संतुलन बनाने से लेकर बर्फ़ जाँचने तक के सारे कामों में आपका साथ देगी |

रेनकोट या पोंचो या बारिश से बचने का उपाय जरूर करके जाएँ | यहाँ आपको बारिश मिलेगी ही मिलेगी | अपना सारा सामान पॉलिथीन में डाल कर फिर बैग में डालें | इससे कपडे सूखे रहेंगे |

टेंट में सोना उतना आसान भी नहीं होता ख़ास कर यात्रा के समय | टेंट में कम्बल यात्रियों की संख्या देख कर दिए जाते हैं, मसलन कभी आपको तीन भी मिल सकते हैं और कभी एक से ही काम चलाना पड़ सकता है | अगर स्लीपिंग बैग उठाने का ज़ज़्बा रखते हों तो ले जाएँ |

हम चण्डीगढ़ से रात आठ बजे चले और सुबह आठ बजे हमने चढ़ना शुरू कर दिया | खैर अगले दिन हम बस पाँच- छः किलोमीटर ही चले और भीम द्वार सुबह दस बजे पहुँचने के बाबजूद हम आगे नहीं गए | शरीर को अभ्यस्त होने के लिए थोड़ा समय चाहिए वो उसे जरूर दें | पहाड़ों में आए हैं तो आराम से चलिए थोड़ा समय नज़ारे देखने में भी बिताईये |

हम पाँच लोगों ने इस यात्रा को पूरा करने में चार दिन तीन रात का समय लिया | पहले दिन हम काली घटी के नीचे भीम तलाई में रुके | दूसरे दिन हम भीम द्वार में रुके और इस दिन का अधिकतर समय आराम में ही बीता जिससे की शरीर को रेस्ट भी मिली और वो अभ्यस्त भी हो गया | तीसरे दिन हम श्रीखण्ड़ महादेव के दर्शन कर वापिस कुंशा में आ कर रुके, इस दिन सबसे ज्यादा मेहनत की गई | हम रात दो बजे ही भीम द्वार से निकल गए थे और सुबह आठ बजे हमने श्रीखण्ड़ महादेव के दर्शन किये | दोपहर दो बजे तक हम वापिस भीम द्वार आ गए जहाँ हमने थोड़ी देर विश्राम किया और रात कुंशा में काटी | चौथे दिन कुंशा से रामपुर होते हुए वापिस चण्डीगढ़ पहुँच गए | 
   
यात्रा ख़र्च

चण्डीगढ़ से रामपुर तक की बस टिकट = 370 रुपए/प्रतिव्यक्ति 
रामपुर से जाओं प्राइवेट टैक्सी = 1400 रुपए पाँच लोगों के
भीम तलाई में टेंट ख़र्च = 700 रुपए सिर्फ सोने के पाँच लोगों के
भीम द्वार में टेंट एवं दो टाइम खाने का ख़र्च = 2100 रुपए पाँच लोगों के 
कुंशा में टेंट एवं रात का खाना = 1000 रुपए 5 लोगों के 
चाय = 15  रूपए कप (थटीबी में) और 25 रुपए कप भीम द्वार में 
मैगी = 40 रुपए की एक भीम द्वार में 
जाओं से रामपुर वापिसी प्राइवेट टैक्सी में = 1400 रुपए पाँच लोगों के (वैसे शेयर्ड टैक्सी में किराया 150 से 300 रुपए सवारी है पर उसका भर जाने का इंतज़ार करना पड़ता है ) 

एक व्यक्ति का यात्रा बजट = लगभग 2500 रुपए 

अगर जा रहें हों तो कम से कम 5000 कैश में लेकर जाएँ | ऊंचाई के साथ कीमत भी बढ़ती है और भूख भी | हम यात्रा से दो दिन पहले गए थे तो हमें इतने लँगर और मुफ्त टेंट नहीं मिले जितने यात्रा के समय होते हैं | आप यात्रा के समय जा सकते हैं और काफी पैसे बचा सकते हैं, पर उस समय भीड़ बहुत होगी | 
  
कुछ अन्य जानकारी :

इस यात्रा की कुल दुरी लगभग 46 किलोमीटर है, आना-जाना मिला कर |
आधिकारिक यात्रा के समय यात्रियों का मेडिकल चेकअप यात्रा की शुरुआत में ही होता है, जिसके लिए 50 रुपए शुल्क लिया जाता है | अनफिट यात्रियों को वापिस भेज दिया जाता है |
अपने साथ बादाम, काजू अदि सूखे मेवे भरपूर मात्रा में रखें | इस यात्रा में आपका बहुत ज़ोर लगने वाला है |
थाचडू तक मोबाइल में पूरा सिग्नल आता है | इसके बाद सिग्नल कुंशा में मिलेगा और उसके आगे श्रीखण्ड़ महादेव की चोटी पर |
आधिकारिक रूप से श्रीखंड कैलाश यात्रा श्री पंचदशनाम जूना अखाडा के नेतृत्व में ज्यूरी के महादेव मंदिर से शुरू होती है | छड़ी यात्रा गुरुपूर्णिमा को श्रीखंड महादेव पहुँचती है | ये रास्ता अलग है और अधिक दुर्गम है |  

दूरी सम्बन्धी जानकारी :

जाओं से बराहटी नाला = 5.6 Km
बराहटी नाले से थाचडू = 4.3 Km
थाचडू से काली घाटी टॉप = 1.6 Km
कालीघाटी टॉप से कुंशा = 2.8 Km
कुंशा से भीमद्वार = 3.6 Km
भीमद्वार से पार्वती बाग़ = 1.3 Km
पार्वती बाग़ से भीमबही = 3.7 Km
भीमबही से श्रीखण्ड़ महादेव = 0.7 Km

कुल दूरी = 23.6 Km (एक तरफ़ की)

अगर आप जाएँ तो पास ही सराहन में भीमाकाली का मंदिर है वहाँ जरूर जाएँ | जैसे श्रीखण्ड़ यात्रा भस्मासुर से जुड़ी है वैसे ही भीमाकाली का मंदिर महिषासुर वध से जुड़ा है | भीमाकाली मंदिर, सराहन वही स्थान है जहाँ सती माता के कान गिरे और ये इक्क्यावन शक्ति पीठों में से एक है | बारासुर और कृष्ण जी का युद्ध भी यहीं हुआ था और वर्तमान में यहाँ एक पाँच मंजिला मंदिर है | सराहन का भीमाकाली मंदिर कोट शैली में बना है और अद्भुत कला का नमूना है |
खैर अब अगर रामपुर की बात करें तो जो कभी बुशहर की राजधानी था, आज अपना बहुत सारा इतिहास खो चुका है | अब तो ये सिर्फ एक बाजार रह गया है जहाँ लोग अपनी जरुरत का सामान लेने आते हैं |



गर है स्वर्ग ज़मीं पर 
तो है वो यहीं 
ये नज़ारे ये पहाड़
धरती के तो नहीं
और श्रीखंड जो 
उठा हुआ है अलग सबसे
वो शिव सवरूप 
कहीं स्वर्ग की अंतिम सीढ़ी तो नहीं

वो बही खाता भीम का 
वो पार्वती माँ का नैन सरोवर 
वो बाग़ अठखेलियों का 
वो झरने जो जुदा थे मिले यहीं 
और ये फिसलन चट्टान की
मैं मर ही न जाऊँ यहीं

ऊपर चढ़ना आसान है 
नीचे उतरना मुश्किल
और ऊपर से ये फिसलन
कृपा रही भोलेनाथ की 
जो आ गया सकुशल

जय भोले

उच्याँ पहाड़ाँ दियाँ चढ़ाइयाँ चढ़ी ने
मेरे भोले जी दा डेरा
दुनिया जान्दी मैं भी जाणा 
भोले जी दा दर्शन पाणा
ऐ दिल करदा मेरा 
भक्ता मेरे भोले जी दा डेरा
उच्याँ पहाड़ाँ दियाँ चढ़ाइयाँ चढ़ी ने
मेरे भोले जी दा डेरा 

श्रीखण्ड़ महादेव की जय


 "ये यात्रा कठिन भी नहीं है और आसान भी नहीं है"

Saturday, 27 May 2017

घुमक्कड़ों के लिए मोबाइल एप्प्स (Mobile Apps For Trekkers/Hikers/Travellers/Tourists)

स्मार्टफोन आज हर किसी की प्राथमिक ज़रूरत बन चुका है | आजकल किसी के पास कुछ हो न हो स्मार्टफ़ोन जरूर है | घुमन्तु जीवों के लिए मोबाइल फ़ोन न केवल बात करने का साधन है बल्कि रास्ता पता लगाना, होटल ढूँढ़ना, फ़ोटो खींचना, टोर्च, घड़ी, कम्पास आदि सभी जन्त्रों का काम इससे लिया जाता है | आज इसी स्मर्टफ़ोन और घुमक्कड़ों को ध्यान में रखते हुए ये पोस्ट लिखी जा रही है, ताकि सभी इस टेक्नोलॉजी का और बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकें | कुछ अच्छे एप्पस डाउनलोड लिंक के साथ नीचे दिए गए हैं :

माई ट्रैक्स (My Tracks): 
आपके रास्ते का हिसाब रखने वाली ये एप्प न केवल दूरी समय और रफ़्तार नपती है बल्कि ऊंचाई, चढाई का ग्रेड और मैप पर आपका रास्ता सब संजो कर रखती है | ये एप्प GPS के द्वारा चलती है और अगर मोबाइल में इंटरनेट न भी हो तो भी आप इसे इस्तेमाल कर सकते हैं, बस आपको मैप पर जगहों के नाम नहीं दिखाई देंगे | इस एप्प की सबसे ख़ास बात यह है कि ये बहुत कम बैटरी खाती है | नीचे दिए लिंक से डाउनलोड कर अपनी अगली यात्रा को संजो कर रख लें |

 

रेडमी का मोबाइल इस्तेमाल करने वाले ध्यान दें :
एप्प शुरू करने के बाद इसे मेमोरी में लॉक करना न भूलें जिसका तरीका इस प्रकार है :
बहिना बटन दबाएं जिससे खुली हुई एप्प्स सामने आ जाएँ
इस एप्प को नीचे की तरफ़ सरकाएं
ऊपर आए ताले पर क्लिक करें
एक नीला ताला एप्प पर बन जाएगा जिसका मतलब है एप्प लॉक हो चुकी है
अब एप्प मोबाइल लॉक करने पर भी बंद नहीं होगी
ये तरीका किसी भी एप्प के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जो अक्सर फ़ोन लॉक करने पर बंद हो जाती है |

पीक फाईँडर (Peak finder) :
आप किसी ऊँचे स्थान पर खड़े हो और सामने दिख रहे पहाड़ों का नाम जानना चाहते हो तो यह एप्प आपको चोटियों के नाम और ऊँचाई बताएगी । शुरुआत में इसमें भी करीब 100 mb का डाटा डाउनलोड करना पड़ेगा । अगर इसमें जगह सेट करने में कोई परेशानी आये तो सर्च में जा कर पास के किसी ऊँचे पर्वत को सिलेक्ट कर लीजिए और चोटियों की बनावट से आप समझ जाएंगे की कौन सी कौन है ।



Cover art
साईजिक मैप्स (GPS Navigation & Maps Sygic) : 
गूगल मैप्स का अच्छा विकल्प है जो बिना इंटरनेट के GPS से चलता है । पहली बार आप जब ये एप्प शुरू करेंगे तो आपको पूरे भारत का मैप डाटा इन्टरनेट से डाउनलोड करना पड़ेगा जोकि लगभग 1.5 GB का होगा । इसके बाद आपको फिर कभी इन्टरनेट की जरुरत नहीं पड़ेगी और पूरे भारत के मानचित्र एवं सभी सड़कों का ब्यौरा आपके मोबाइल में हर समय होगा |



फोटोशॉप मोबाइल फुल एप्प (Photoshop Mobile Paid) :
Cover art
बहुत सारे घुमंतुओं के पास DSLR कैमरा है और अधिकतर RAW में फ़ोटो खींचना पसंद करते हैं | ये एप्प आपको RAW फोटो मोबाइल में एडिट करने कि क्षमता देती है | कैमरे से मोबाइल में फ़ोटो डालिये और इस एप्प में एडिट करके तत्काल फेसबुक, ट्विटर पर शेयर करिये बिना लैपटॉप या कंप्यूटर कि मदद के वो भी उन्हीं सभी ऑप्शन्स के साथ जो आपको कंप्यूटर पर मिलते हैं |अगर आपके कैमरे में wifi नहीं है तो कैमरे से मोबाइल में फोटो डालने के लिए कैमरे की usb केबल को OTG केबल के ज़रिये मोबाइल से जोड़ा जा सकता है व फोटो कॉपी किए जा सकते हैं ।

नोट:  इस एप्प में .ARW फाइल फॉर्मेट नहीं चलता है |


सनैपसीड़ (Snapseed) : 
अगर आप मोबाइल से फोटो खींचते हैं तो ये एप्प आपके लिए बिल्कुल सही है | चंद लम्हों में आप साधारण सी फोटो को असाधारण रूप दे सकते हैं | इस एप्प में ढेरों ऑप्शन्स हैं जो आपकी फोटो पर चार चाँद लगा देंगें |


मौजूदा एप्प्स का रचनात्मक प्रयोग :
रिकॉर्डर (Voice Recorder) : 
अक्सर कहीं जाता हूँ तो वहाँ के इतिहास, मौजूदा हालात आदि की जानकारी इकट्ठी करने की कोशिश करता हूँ | ऐसे में मेरा अनुभव है कि जब भी आप किसी अजनबी से बात करें तो वीडियो की जगह आवाज़ ही रिकॉर्ड करें | इससे वे असहज नहीं होंगे और आप बाद में रिकॉर्डिंग सुन कर ब्लॉग या डायरी में लिख सकते हैं | वीडियो में ज्यादा बैटरी ख़र्च होती है और इतनी सारी जानकारी को याद रख पाना पुश्किल होता है | तथ्यों को याद रखने कि बजाय रिकॉर्ड कर लें | ये काम आप बातचीत के बाद केवल अपनी आवाज़ में भी कर सकतें हैं |


नोट्स (Notes) :
यात्रा के खर्च का हिसाब रखना हो या बाद के लिए कुछ लिख के रखना चाहते हों । ये एप्प उन लोगों के लिए बहुत अच्छी है जो यात्रा से लौट कर शीघ्र अतिशीघ्र ब्लॉग लिखना चाहते हैं । यात्रा के दौरान खाली समय में आप इस एप्प में अपना ब्यौरा लिख लीजिये फिर इन्टरनेट चलने पर उसे ब्लॉगर में कॉपी पेस्ट कर दीजिए और पब्लिश या ड्राफ्ट सेव कर लीजिए । यह पोस्ट भी अधिकाँश रूप से इसी ऐप्प में लिखी गई है ।


मौसम (AccuWeather) :
कहीं भी घूमने जा रहे हों तो इस ऐप्प पर आने वाले दिनों का मौसम अनुमान ज़रूर देख लें और उस हिसाब से तैयारी रखें ।


टेक्नोलॉजी पर बहुत ज्यादा भरोसा भी न करें, यह कहीं भी दम तोड़ सकती है । हमेशा दूसरा विकल्प सोच कर चलें । जैसा कि मेरे गुरूजी का कहना है कि एक धागा अगर हिमालय की ऊंचाइयों पर फ़ेल हो जाए तो जानलेवा सिद्ध हो सकता है । हमेशा सचेत, सब कुछ चेक करके चलें । भगवान भरोसे कुछ न छोड़ें ।
इस पोस्ट में लिखी गई तमाम जानकारी गुरूजी तथा मेरे अपने अनुभवों पर आधारित है । आप सबसे विनम्र विनती है कि आप भी अपना अनुभव साँझा करें और ऐसी ही लाभदायक एप्प्स, तरीकों के बारे में बाकि घुम्मकड़ों को जानकारी दें ताकि सभी एक दूसरे के अनुभवों का लाभ उठा सकें.....

बाँट देता हूँ जो भी छान लाता हूँ
ठाँव-ठाँव की ख़ाक से
मेरा तो खैर कभी कुछ न था

सीमित संजो कर रखूँ भी किस लिए
हक़ पर तो हक
कभी किसी का न था

ज्ञान है भी तो क्या आज, एक जानकारी
कुछ उन्होंने दी कुछ हमने मारी
असल का पता तो खैर जिसको है उसको था

खैर आज के घुमक्कड़ों में दो रोग हैं, मैं सबसे पहले गया, दूसरा जो भी मेरे बाद घूमने जा रहा है वो गन्दगी फैला रहा है, परमिट लगा देना चाहिए, बैन कर देना चाहिए | ऐसा ही रोग मीडिया में भी है एक्सक्लूसिव, हमने सबसे पहले दिखाया, दूसरा सोशल मीडिया अफवाह फैलाता है, इसको बैन करो | पता नहीं किस बात की होड़ लगी पड़ी है सब में.....


पहाड़ों के हुए घुमक्कड़ों के नाम......

Friday, 19 May 2017

फतेहगढ़ साहिब

हमरे वंश रीत ईम आई
शीश देत पर धर्म न जाई

यही कहा था छोटे साहिबज़ादों ने एक स्वर में, बुलंद आवाज़ में, भरे दरबार में जब वज़ीर खान ने उन्हें जान बचाने के लिए अपना सिख धर्म छोड़ इस्लाम कबूल करने को कहा था | 26 दिसम्बर 1705 के दिन उन्होंने भी अपने दादा जी के नक़्शे कदम पर चलते हुए धर्म त्यागने के बदले जान देना उचित समझा | शहीद साहिबज़ादे बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फ़तेह सिंह जी तब सिर्फ़ 9 और 6 साल के थे |

गुरु अर्जनदेव जी पहले शहीद हुए
तब से ही सिंह सशस्त्र वीर हुए
खुसरो को दी शरण जहांगीर से बचाया
आते काल को देख बेटा गुरु बनाया
मुग़ल हुआ है वहशी बुरा वक्त है आया
अगर प्रेम और सहनशीलता से मैं जीत न पाया
फिर तुम कर धारण शस्त्र धर्म बचाना
देख लिया था गुरु ने होनी का होना
चले गए लाहौर जहांगीर बुलाया
और उनपर फिर झूठा मुकदम्मा चलवाया
दो लाख का दिया जुर्माना लगाया
आदि ग्रन्थ में कुछ फेर सुझाया
पर गुरु दृढ़ जहांगीर के हाथ न आया
जहांगीर गुरु सौंप चंदू को, जिस द्वेष दिखाया
हैवान को भी हैवानियत पर तरस था आया
जेठ महीने गुरु पानी की देग उबाला
और ऊपर सिर पर गर्म रेत भी डाला
गुरु सहा सब तेरा भाणा मिट्ठा जो लागा
रावी के जल में बहा, यासा था साधा

सेली टोपी छोड़ अब कलगी दस्तार जो पहनी
दरवेश बादशाह संत सिपाही चार एक के सानी
मिरी पीरी की दो तलवारें गुरु हरगोबिन्द लिए उठाए
योद्धा बड़ा पराक्रमी जिस सिंह सैनिक बनाए
बावन राजा मुक्त कराए चार युद्ध लड़ आए
तभी बंदीछोड़ पातशाह कहलाए
हरिमंदिर के सामने अकालतख़्त बनाए
जो किरतपुर में गए ज्योतिजोत समाए

गुरु तेग बहादुर के पास कश्मीरी पण्डित आए
फिर गुरु गोबिंद सिंह जो मार्ग सुझाए
बंदी बने गुरु संग तीन सिख भी आए
मुग़ल जिन्हें सिरहिन्द से दिल्ली लाए
लाख उकसावे औरंगज़ेब पर गुरु चमत्कार न दिखलाए
उस पर्म पिता के काम में दखल न पाए
दयाल दास जिस मुग़ल दो टुकड़े कराए
मती दास जिस खोलते तेल में गोते लाए
सती दास जिस लपेट रुईं में आग लगाई
गुरु रहे अडिग सब देख वाहे गुरु जपते जाए
मुग़ल को अपनी वहशत पर शर्म न आए
इस्लाम के नाम पर जुल्म जो ढाए
गुरु दे शीश परलोक जो पाए

सूबा-ऐ-सरहिंद में आज अत्याचार की प्रलय है आयी
दो बच्चों की जान का हुक्म है शाही
नवाब मलेरकोटला जिस लाया हा दा नारा
बाप का बदला बेटों से ये कैसा फ़रमान तुम्हारा
गल-सड़ गया है वज़ीर खान अंदर का मुस्लमान तुम्हारा

सूबा-ऐ-सरहिंद सब दे रहा दुहाई
किस नींव पर आज तुमने ये दीवार बनाई
अहंकार, बदला और द्वेष
आखिर इनकी भी तो कोई हद होगी भाई
ऐ वज़ीर खान तूने ये कैसी वहशत है दिखलाई
मासूम, खिलते खेलते बच्चे किसे न भाते
और दे फतवा आज तुम हो दीवारों में चिनवाते

राजमिस्त्री लगा है करने चिनवाई
धर्म की राह पर अटल हैं दोनों भाई
साहस, विश्वास और निर्भयता मुख तेज रूहानी
जपजी साहिब जपते दोनों एक जुबानी

दीवार में चिनता हुआ मिस्त्री घुटनों तक पहुँचा
ईंट तोड़-तोड़ बनाने लगा घुटनों के लिए खाँचा
बोला फिर वज़ीर खां मुँह से शब्द ये छूटे
तोड़ दे तू ये घुटना पर ईंट न टूटे
दीवार रहे सीधी चाहे छीलें या फूटें
जो न कबूले इस्लाम उसको यही सजा है भाई
सुच्चानन्द ने कहा ठीक
ये तो उसी सांप के सपोले हैं भाई

जब पहुंची दीवार फ़तेह के सिर तक
तो बोला वो सुन बड़े भाई
आया था तुझसे बाद पर
तुझसे पहले है मौत ब्याही
तुमसे अच्छी किस्मत है मैंने पायी
चला हूँ उस राह जिस गुरु दिखाया
मिलने अपने पुरखे जिस धर्म बचाया

गुरु गोबिंद पिता हम बच्चे जिनके
देख हमारे वंश के बलिदान कितने
और तू डराता हमको मौत दिखा के
अडिग हैं हम धर्म की राह पर
जो मर्जी अत्याचार तू डाह ले

चिन गई दीवार साहिबजादे भी चिन गए
9 और 6 साल के बच्चे आज बड़ा साका कर गए
जिस राह बड़े-बड़े न चल सके
उस राह हंसी ख़ुशी हैं चल गए

होनी को भी इस अत्याचार पे शर्म थी आयी
काल भी खा न सका दो पवित्र भाई
कुछ पल बाद ही थी दीवार गिराई
अभी भी जिन्दा थे दोनों
मौत हाथ भी न थी लगा पाई

वज़ीर खान को फिर भी शर्म न आयी
निर्दोष बच्चों पर फिर उसने कठोर क्रूरता दिखलाई
बैठ छाती पर दोनों का गला कटवाया
दरिंदगी का परचम सूबा सरहिंद लहराया

ऐसी शहीदी न देखी कहीं जग देख मुकाया
चारों सुत देकर दशमेश नाम कमाया
सरवंश दान कर सरवंश दानी कहलाया
धन गुरु गोबिंद सिंह आपे गुरु-चेला
जिस धर्म की खातिर क्या न लुटाया

आठ महीने, अनन्दपुर के किले को मुग़ल तथा पहाड़ी राजाओं कि संगठित फ़ौज घेर कर बैठी रही | आपसी रजामंदी पर जब गुरु गोबिंद सिंह जी सपरिवार बाकि सिंहों के साथ अनन्दपुर से निकलते हैं तो पहाड़ी राजाओं के मुग़लों के साथ मिलकर अचानक किए गए विश्वासघाती हमले के चलते सिरसा नदी को पार करते हुए परिवार के तीन हिस्से हो जाते हैं | गुरु गोबिंद सिंह जी बड़े साहिबज़ादों (बाबा अजित सिंह जी एवं बाबा जुझार सिंह जी) के साथ निहंग खां पठान के पास ठहरने के बाद 7 पोह (20 दिसम्बर 1705) की शाम तक चमकौर पहुँचते हैं | माता सिमरत कौर जी और माता साहिब कौर जी माई भागोवाल जी के साथ एक रात रोपड़ में गुज़ारने के बाद दिल्ली की तरफ चलीं जातीं हैं | गुरु माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादे (बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फ़तेह सिंह जी) सिरसा और सतलुज के किनारे-किनारे चलते हुए बाबे कुम्मे मश्क़ी की घास-फूस की झोंपड़ी में रात बिताने के बाद 8 पोह को रसोईये गँगू के घर ठहरते हैं |
गँगू को सिख इतिहास में गँगू पापी भी कहा जाता हैं क्यूँकि वो शाही ईनाम के लालच में आकर 9 पोह की सुबह मोरिंडा के कोतवाल जानी खां और मानी खां को गुरु माता और छोटे साहिबज़ादों का पता बता देता है | 10 पोह को माता गुजरी और छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद लाया जाता है और ठन्डे बुर्ज़ में कैद कर दिया जाता है | 11 पोह को पहली पेशी होती है फिर 12 को दूसरी और 13 पोह को उन 9 और 6 साल के बच्चों को नींव में चिनवा दिए जाने का शाही फ़रमान जारी किया जाता है |


गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब, जहाँ छोटे साहिबज़ादों को नींव में चिनवा दिया गया | नींव में चिनवाने के बाद मुग़लों को अब भी यकीन न हुआ था कि वाकई उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी के वंश का अंत कर दिया है या नहीं | दीवार गिर गई और बाद में अत्याचारी वज़ीर खां ने छोटे साहिबज़ादों का अचेत अवस्था में सिर कलम करने का आदेश सुनाया |


इन पुत्रन के कारने वार दिए सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार
-गुरु गोबिंद सिंह जी

अपने असंख्य पुत्रों की रक्षा हेतु
मैंने वार दिए अपने सुत चार
जिस धर्म की खातिर चार गए
उसे जीवित रखते ये हज़ार

खैर मुग़ल जिसे वंश का अंत समझ रहे थे वो कहाँ जानते थे कि गुरु गोबिंद सिंह जी तो दशमेश पिता बन चुके हैं | हर एक सिंह स्वयं गुरु गोबिंद जी का बेटा है |



गुरुद्वारा साहिब ठण्डा बुर्ज़ जहाँ माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादों को कैद करके रखा गया और यहीं माता गुजरी जी ने प्राण त्याग दिए |
गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप साहिब जहाँ माता गुजरी जी तथा छोटे साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार किया गया | यह गुरुद्वारा जिस जगह बना है वह संसार की सबसे महँगी ज़मीन है जिसे गुरु गोबिंद सिंह के अनुयायी दीवान टोडर मल ने अत्याचारी वज़ीर खां से खरीदा | जब माता गुजरी और छोटे साहिबज़ादे शहीदी पा गए तो क्रूर वज़ीर खां ने उनका संस्कार करने के लिए भी ज़मीन न दी और यह शर्त रखी की सोने के सिक्कों को खड़ा करके ज़मीन लेलो और संस्कार कर लो | तब टोडर मल जी जो गुरु गोबिंद सिंह के सच्चे अनुयायी थे, उनहोंने इस संसार की सबसे महँगी ज़मीन को बाशर्त खरीदा और माता गुज़री तथा छोटे साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार किया | उनके गुरुधर्म पर अटल बने रहने के कारण उन्हें दीवान की उपाधि दी गई |


सरहिंद फतेहगढ़ साहिब का पुराना नाम है | बाबा फ़तेह सिंह जी के नाम पर इसका नाम फतेहगढ़ साहिब किया गया | पंजाब राज्य में फतेहगढ़ साहिब जिला है | फतेहगढ़ साहिब शहर में आने-जाने के लिए चार रास्ते हैं | चारों रास्तों पर भव्य द्वार बनाए गए हैं | इन द्वारों के नाम हैं :
1. बाबा बन्दा सिंह बहादुर द्वार (जिन्होंने मुग़लों को हरा कर फिर से सुशासन स्थापित किया)
2. दीवान टोडरमल द्वार (जिन्होंने संसार कि सबसे महंगी ज़मीन ख़रीद छोटे साहिबज़ादों और माता गुजरी जी का संस्कार किया)
3. बाबा मोती राम मेहरा द्वार (जिन्होंने ठण्डे बुर्ज़ में बंदी बनाए गए छोटे साहिबज़ादे और माता गुजरी जी को दूध पिलाने कि सेवा की और वज़ीर ख़ान ने उन्हें परिवार सहित कोहलू में पिसवा दिया)
4. नवाब शेर मुहम्मद ख़ान द्वार (जिन्होंने वज़ीर ख़ान के उकसावे में न आकर अपने भाई की मौत का बदला बच्चों से लेना उचित न समझा व उसके इस कृत्य की कड़ी निंदा की)


14 मई 1710 को वज़ीर ख़ान को उसके अत्याचारों कि कीमत चुकानी पड़ी | बन्दा सिंह बहादुर जी के नेतृत्व में सिंहो ने सरहिंद फ़तेह कर फिर से सुशासन स्थापित किया | 

हर साल 26 से 28 दिसंबर, शहीदी जोड़ मेला और 12 से 14 मई, सरहिंद फ़तेह मेला लगता है | इन्हीं मेलों के आस-पास यात्रा करें तो आपको पंजाब की अच्छी झलक देखने को मिलेगी |

चण्डीगढ़ से फतेहगढ़ साहिब लगभग 50 km दूर है | जेठ (15 मई 2017 ) महीने में की गई इस साइकिल यात्रा में गर्मी का भीषण प्रकोप रहा और बाकि की कसर SH-12A के जानलेवा ट्रैफिक ने निकाल दी | अगर इन गर्मियों में कहीं यात्रा कर रहे हों तो सुबह या शाम को ही करें, गर्मी में निकलने से बचें | हमेशा पानी का घूँट भर कर रखें इससे गला नहीं सूखेगा, साँस लेने में भी कम तकलीफ़ होगी और दिमाग़ को यह विरोधाभास रहेगा की पानी की कमी नहीं है जिससे माँसपेशियों में क्रैम्प पड़ने का अंदेशा भी कम रहेगा | शरीर पूरा ढक कर चलें लू से बचाव रहेगा | भरी गर्मी में मशक्कत करने पर सबसे  पहले पसीना आता है फिर पसीना आना बंद होता है फिर नाक बहती है इससे आगे आप बेहोश हो सकते हैं | जिस्म की स्तिथि का अंदाज़ा मूत्र के रंग से भी लगाया जा सकता है | साइकिल चलाते हुए बारी-बारी से एक टाँग से ज़ोर लगाएँ और दूसरी को रेस्ट करने दें इससे आप लगातार ज़्यादा दूरी तय कर सकते हैं | कृप्या हेडफोन लगा कर साइकिल न चलाएँ और हो सके तो साइकिल में रियर व्यू मिर्रर लगवा लें इससे बार-बार पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ेगा व गर्दन को भी आराम रहेगा | बाकि रास्ते की जानकारी आपको गूगल मैप्स पर मिल जाएगी |



मैं चारे पुत्त क्यों वारे ज़रा विचारयो
जे चले ओ सरहन्द नूं मेरे प्यारओ
मेरे लालां दे नाल रेह के रात गुज़ारयो

कुछ अन्य यात्राएँ जो सिख इतिहास से सम्बन्ध रखतीं हैं :

चमकौर साहिब यात्रा