Saturday, 27 May 2017

घुमक्कड़ों के लिए मोबाइल एप्प्स (Mobile Apps For Trekkers/Hikers/Travellers/Tourists)

स्मार्टफोन आज हर किसी की प्राथमिक ज़रूरत बन चुका है | आजकल किसी के पास कुछ हो न हो स्मार्टफ़ोन जरूर है | घुमन्तु जीवों के लिए मोबाइल फ़ोन न केवल बात करने का साधन है बल्कि रास्ता पता लगाना, होटल ढूँढ़ना, फ़ोटो खींचना, टोर्च, घड़ी, कम्पास आदि सभी जन्त्रों का काम इससे लिया जाता है | आज इसी स्मर्टफ़ोन और घुमक्कड़ों को ध्यान में रखते हुए ये पोस्ट लिखी जा रही है, ताकि सभी इस टेक्नोलॉजी का और बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकें | कुछ अच्छे एप्पस डाउनलोड लिंक के साथ नीचे दिए गए हैं :

माई ट्रैक्स (My Tracks): 
आपके रास्ते का हिसाब रखने वाली ये एप्प न केवल दूरी समय और रफ़्तार नपती है बल्कि ऊंचाई, चढाई का ग्रेड और मैप पर आपका रास्ता सब संजो कर रखती है | ये एप्प GPS के द्वारा चलती है और अगर मोबाइल में इंटरनेट न भी हो तो भी आप इसे इस्तेमाल कर सकते हैं, बस आपको मैप पर जगहों के नाम नहीं दिखाई देंगे | इस एप्प की सबसे ख़ास बात यह है कि ये बहुत कम बैटरी खाती है | नीचे दिए लिंक से डाउनलोड कर अपनी अगली यात्रा को संजो कर रख लें |

 

रेडमी का मोबाइल इस्तेमाल करने वाले ध्यान दें :
एप्प शुरू करने के बाद इसे मेमोरी में लॉक करना न भूलें जिसका तरीका इस प्रकार है :
बहिना बटन दबाएं जिससे खुली हुई एप्प्स सामने आ जाएँ
इस एप्प को नीचे की तरफ़ सरकाएं
ऊपर आए ताले पर क्लिक करें
एक नीला ताला एप्प पर बन जाएगा जिसका मतलब है एप्प लॉक हो चुकी है
अब एप्प मोबाइल लॉक करने पर भी बंद नहीं होगी
ये तरीका किसी भी एप्प के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है जो अक्सर फ़ोन लॉक करने पर बंद हो जाती है |

पीक फाईँडर (Peak finder) :
आप किसी ऊँचे स्थान पर खड़े हो और सामने दिख रहे पहाड़ों का नाम जानना चाहते हो तो यह एप्प आपको चोटियों के नाम और ऊँचाई बताएगी । शुरुआत में इसमें भी करीब 100 mb का डाटा डाउनलोड करना पड़ेगा । अगर इसमें जगह सेट करने में कोई परेशानी आये तो सर्च में जा कर पास के किसी ऊँचे पर्वत को सिलेक्ट कर लीजिए और चोटियों की बनावट से आप समझ जाएंगे की कौन सी कौन है ।



Cover art
साईजिक मैप्स (GPS Navigation & Maps Sygic) : 
गूगल मैप्स का अच्छा विकल्प है जो बिना इंटरनेट के GPS से चलता है । पहली बार आप जब ये एप्प शुरू करेंगे तो आपको पूरे भारत का मैप डाटा इन्टरनेट से डाउनलोड करना पड़ेगा जोकि लगभग 1.5 GB का होगा । इसके बाद आपको फिर कभी इन्टरनेट की जरुरत नहीं पड़ेगी और पूरे भारत के मानचित्र एवं सभी सड़कों का ब्यौरा आपके मोबाइल में हर समय होगा |



फोटोशॉप मोबाइल फुल एप्प (Photoshop Mobile Paid) :
Cover art
बहुत सारे घुमंतुओं के पास DSLR कैमरा है और अधिकतर RAW में फ़ोटो खींचना पसंद करते हैं | ये एप्प आपको RAW फोटो मोबाइल में एडिट करने कि क्षमता देती है | कैमरे से मोबाइल में फ़ोटो डालिये और इस एप्प में एडिट करके तत्काल फेसबुक, ट्विटर पर शेयर करिये बिना लैपटॉप या कंप्यूटर कि मदद के वो भी उन्हीं सभी ऑप्शन्स के साथ जो आपको कंप्यूटर पर मिलते हैं |अगर आपके कैमरे में wifi नहीं है तो कैमरे से मोबाइल में फोटो डालने के लिए कैमरे की usb केबल को OTG केबल के ज़रिये मोबाइल से जोड़ा जा सकता है व फोटो कॉपी किए जा सकते हैं ।

नोट:  इस एप्प में .ARW फाइल फॉर्मेट नहीं चलता है |


सनैपसीड़ (Snapseed) : 
अगर आप मोबाइल से फोटो खींचते हैं तो ये एप्प आपके लिए बिल्कुल सही है | चंद लम्हों में आप साधारण सी फोटो को असाधारण रूप दे सकते हैं | इस एप्प में ढेरों ऑप्शन्स हैं जो आपकी फोटो पर चार चाँद लगा देंगें |


मौजूदा एप्प्स का रचनात्मक प्रयोग :
रिकॉर्डर (Voice Recorder) : 
अक्सर कहीं जाता हूँ तो वहाँ के इतिहास, मौजूदा हालात आदि की जानकारी इकट्ठी करने की कोशिश करता हूँ | ऐसे में मेरा अनुभव है कि जब भी आप किसी अजनबी से बात करें तो वीडियो की जगह आवाज़ ही रिकॉर्ड करें | इससे वे असहज नहीं होंगे और आप बाद में रिकॉर्डिंग सुन कर ब्लॉग या डायरी में लिख सकते हैं | वीडियो में ज्यादा बैटरी ख़र्च होती है और इतनी सारी जानकारी को याद रख पाना पुश्किल होता है | तथ्यों को याद रखने कि बजाय रिकॉर्ड कर लें | ये काम आप बातचीत के बाद केवल अपनी आवाज़ में भी कर सकतें हैं |


नोट्स (Notes) :
यात्रा के खर्च का हिसाब रखना हो या बाद के लिए कुछ लिख के रखना चाहते हों । ये एप्प उन लोगों के लिए बहुत अच्छी है जो यात्रा से लौट कर शीघ्र अतिशीघ्र ब्लॉग लिखना चाहते हैं । यात्रा के दौरान खाली समय में आप इस एप्प में अपना ब्यौरा लिख लीजिये फिर इन्टरनेट चलने पर उसे ब्लॉगर में कॉपी पेस्ट कर दीजिए और पब्लिश या ड्राफ्ट सेव कर लीजिए । यह पोस्ट भी अधिकाँश रूप से इसी ऐप्प में लिखी गई है ।


मौसम (AccuWeather) :
कहीं भी घूमने जा रहे हों तो इस ऐप्प पर आने वाले दिनों का मौसम अनुमान ज़रूर देख लें और उस हिसाब से तैयारी रखें ।


टेक्नोलॉजी पर बहुत ज्यादा भरोसा भी न करें, यह कहीं भी दम तोड़ सकती है । हमेशा दूसरा विकल्प सोच कर चलें । जैसा कि मेरे गुरूजी का कहना है कि एक धागा अगर हिमालय की ऊंचाइयों पर फ़ेल हो जाए तो जानलेवा सिद्ध हो सकता है । हमेशा सचेत, सब कुछ चेक करके चलें । भगवान भरोसे कुछ न छोड़ें ।
इस पोस्ट में लिखी गई तमाम जानकारी गुरूजी तथा मेरे अपने अनुभवों पर आधारित है । आप सबसे विनम्र विनती है कि आप भी अपना अनुभव साँझा करें और ऐसी ही लाभदायक एप्प्स, तरीकों के बारे में बाकि घुम्मकड़ों को जानकारी दें ताकि सभी एक दूसरे के अनुभवों का लाभ उठा सकें.....

बाँट देता हूँ जो भी छान लाता हूँ
ठाँव-ठाँव की ख़ाक से
मेरा तो खैर कभी कुछ न था

सीमित संजो कर रखूँ भी किस लिए
हक़ पर तो हक
कभी किसी का न था

ज्ञान है भी तो क्या आज, एक जानकारी
कुछ उन्होंने दी कुछ हमने मारी
असल का पता तो खैर जिसको है उसको था

खैर आज के घुमक्कड़ों में दो रोग हैं, मैं सबसे पहले गया, दूसरा जो भी मेरे बाद घूमने जा रहा है वो गन्दगी फैला रहा है, परमिट लगा देना चाहिए, बैन कर देना चाहिए | ऐसा ही रोग मीडिया में भी है एक्सक्लूसिव, हमने सबसे पहले दिखाया, दूसरा सोशल मीडिया अफवाह फैलाता है, इसको बैन करो | पता नहीं किस बात की होड़ लगी पड़ी है सब में.....


पहाड़ों के हुए घुमक्कड़ों के नाम......

Friday, 19 May 2017

फतेहगढ़ साहिब

हमरे वंश रीत ईम आई
शीश देत पर धर्म न जाई

यही कहा था छोटे साहिबज़ादों ने एक स्वर में, बुलंद आवाज़ में, भरे दरबार में जब वज़ीर खान ने उन्हें जान बचाने के लिए अपना सिख धर्म छोड़ इस्लाम कबूल करने को कहा था | 26 दिसम्बर 1705 के दिन उन्होंने भी अपने दादा जी के नक़्शे कदम पर चलते हुए धर्म त्यागने के बदले जान देना उचित समझा | शहीद साहिबज़ादे बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फ़तेह सिंह जी तब सिर्फ़ 9 और 6 साल के थे |

गुरु अर्जनदेव जी पहले शहीद हुए
तब से ही सिंह सशस्त्र वीर हुए
खुसरो को दी शरण जहांगीर से बचाया
आते काल को देख बेटा गुरु बनाया
मुग़ल हुआ है वहशी बुरा वक्त है आया
अगर प्रेम और सहनशीलता से मैं जीत न पाया
फिर तुम कर धारण शस्त्र धर्म बचाना
देख लिया था गुरु ने होनी का होना
चले गए लाहौर जहांगीर बुलाया
और उनपर फिर झूठा मुकदम्मा चलवाया
दो लाख का दिया जुर्माना लगाया
आदि ग्रन्थ में कुछ फेर सुझाया
पर गुरु दृढ़ जहांगीर के हाथ न आया
जहांगीर गुरु सौंप चंदू को, जिस द्वेष दिखाया
हैवान को भी हैवानियत पर तरस था आया
जेठ महीने गुरु पानी की देग उबाला
और ऊपर सिर पर गर्म रेत भी डाला
गुरु सहा सब तेरा भाणा मिट्ठा जो लागा
रावी के जल में बहा, यासा था साधा

सेली टोपी छोड़ अब कलगी दस्तार जो पहनी
दरवेश बादशाह संत सिपाही चार एक के सानी
मिरी पीरी की दो तलवारें गुरु हरगोबिन्द लिए उठाए
योद्धा बड़ा पराक्रमी जिस सिंह सैनिक बनाए
बावन राजा मुक्त कराए चार युद्ध लड़ आए
तभी बंदीछोड़ पातशाह कहलाए
हरिमंदिर के सामने अकालतख़्त बनाए
जो किरतपुर में गए ज्योतिजोत समाए

गुरु तेग बहादुर के पास कश्मीरी पण्डित आए
फिर गुरु गोबिंद सिंह जो मार्ग सुझाए
बंदी बने गुरु संग तीन सिख भी आए
मुग़ल जिन्हें सिरहिन्द से दिल्ली लाए
लाख उकसावे औरंगज़ेब पर गुरु चमत्कार न दिखलाए
उस पर्म पिता के काम में दखल न पाए
दयाल दास जिस मुग़ल दो टुकड़े कराए
मती दास जिस खोलते तेल में गोते लाए
सती दास जिस लपेट रुईं में आग लगाई
गुरु रहे अडिग सब देख वाहे गुरु जपते जाए
मुग़ल को अपनी वहशत पर शर्म न आए
इस्लाम के नाम पर जुल्म जो ढाए
गुरु दे शीश परलोक जो पाए

सूबा-ऐ-सरहिंद में आज अत्याचार की प्रलय है आयी
दो बच्चों की जान का हुक्म है शाही
नवाब मलेरकोटला जिस लाया हा दा नारा
बाप का बदला बेटों से ये कैसा फ़रमान तुम्हारा
गल-सड़ गया है वज़ीर खान अंदर का मुस्लमान तुम्हारा

सूबा-ऐ-सरहिंद सब दे रहा दुहाई
किस नींव पर आज तुमने ये दीवार बनाई
अहंकार, बदला और द्वेष
आखिर इनकी भी तो कोई हद होगी भाई
ऐ वज़ीर खान तूने ये कैसी वहशत है दिखलाई
मासूम, खिलते खेलते बच्चे किसे न भाते
और दे फतवा आज तुम हो दीवारों में चिनवाते

राजमिस्त्री लगा है करने चिनवाई
धर्म की राह पर अटल हैं दोनों भाई
साहस, विश्वास और निर्भयता मुख तेज रूहानी
जपजी साहिब जपते दोनों एक जुबानी

दीवार में चिनता हुआ मिस्त्री घुटनों तक पहुँचा
ईंट तोड़-तोड़ बनाने लगा घुटनों के लिए खाँचा
बोला फिर वज़ीर खां मुँह से शब्द ये छूटे
तोड़ दे तू ये घुटना पर ईंट न टूटे
दीवार रहे सीधी चाहे छीलें या फूटें
जो न कबूले इस्लाम उसको यही सजा है भाई
सुच्चानन्द ने कहा ठीक
ये तो उसी सांप के सपोले हैं भाई

जब पहुंची दीवार फ़तेह के सिर तक
तो बोला वो सुन बड़े भाई
आया था तुझसे बाद पर
तुझसे पहले है मौत ब्याही
तुमसे अच्छी किस्मत है मैंने पायी
चला हूँ उस राह जिस गुरु दिखाया
मिलने अपने पुरखे जिस धर्म बचाया

गुरु गोबिंद पिता हम बच्चे जिनके
देख हमारे वंश के बलिदान कितने
और तू डराता हमको मौत दिखा के
अडिग हैं हम धर्म की राह पर
जो मर्जी अत्याचार तू डाह ले

चिन गई दीवार साहिबजादे भी चिन गए
9 और 6 साल के बच्चे आज बड़ा साका कर गए
जिस राह बड़े-बड़े न चल सके
उस राह हंसी ख़ुशी हैं चल गए

होनी को भी इस अत्याचार पे शर्म थी आयी
काल भी खा न सका दो पवित्र भाई
कुछ पल बाद ही थी दीवार गिराई
अभी भी जिन्दा थे दोनों
मौत हाथ भी न थी लगा पाई

वज़ीर खान को फिर भी शर्म न आयी
निर्दोष बच्चों पर फिर उसने कठोर क्रूरता दिखलाई
बैठ छाती पर दोनों का गला कटवाया
दरिंदगी का परचम सूबा सरहिंद लहराया

ऐसी शहीदी न देखी कहीं जग देख मुकाया
चारों सुत देकर दशमेश नाम कमाया
सरवंश दान कर सरवंश दानी कहलाया
धन गुरु गोबिंद सिंह आपे गुरु-चेला
जिस धर्म की खातिर क्या न लुटाया

आठ महीने, अनन्दपुर के किले को मुग़ल तथा पहाड़ी राजाओं कि संगठित फ़ौज घेर कर बैठी रही | आपसी रजामंदी पर जब गुरु गोबिंद सिंह जी सपरिवार बाकि सिंहों के साथ अनन्दपुर से निकलते हैं तो पहाड़ी राजाओं के मुग़लों के साथ मिलकर अचानक किए गए विश्वासघाती हमले के चलते सिरसा नदी को पार करते हुए परिवार के तीन हिस्से हो जाते हैं | गुरु गोबिंद सिंह जी बड़े साहिबज़ादों (बाबा अजित सिंह जी एवं बाबा जुझार सिंह जी) के साथ निहंग खां पठान के पास ठहरने के बाद 7 पोह (20 दिसम्बर 1705) की शाम तक चमकौर पहुँचते हैं | माता सिमरत कौर जी और माता साहिब कौर जी माई भागोवाल जी के साथ एक रात रोपड़ में गुज़ारने के बाद दिल्ली की तरफ चलीं जातीं हैं | गुरु माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादे (बाबा ज़ोरावर सिंह जी और बाबा फ़तेह सिंह जी) सिरसा और सतलुज के किनारे-किनारे चलते हुए बाबे कुम्मे मश्क़ी की घास-फूस की झोंपड़ी में रात बिताने के बाद 8 पोह को रसोईये गँगू के घर ठहरते हैं |
गँगू को सिख इतिहास में गँगू पापी भी कहा जाता हैं क्यूँकि वो शाही ईनाम के लालच में आकर 9 पोह की सुबह मोरिंडा के कोतवाल जानी खां और मानी खां को गुरु माता और छोटे साहिबज़ादों का पता बता देता है | 10 पोह को माता गुजरी और छोटे साहिबज़ादों को सरहिंद लाया जाता है और ठन्डे बुर्ज़ में कैद कर दिया जाता है | 11 पोह को पहली पेशी होती है फिर 12 को दूसरी और 13 पोह को उन 9 और 6 साल के बच्चों को नींव में चिनवा दिए जाने का शाही फ़रमान जारी किया जाता है |


गुरुद्वारा श्री फतेहगढ़ साहिब, जहाँ छोटे साहिबज़ादों को नींव में चिनवा दिया गया | नींव में चिनवाने के बाद मुग़लों को अब भी यकीन न हुआ था कि वाकई उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह जी के वंश का अंत कर दिया है या नहीं | दीवार गिर गई और बाद में अत्याचारी वज़ीर खां ने छोटे साहिबज़ादों का अचेत अवस्था में सिर कलम करने का आदेश सुनाया |


इन पुत्रन के कारने वार दिए सुत चार
चार मुए तो क्या हुआ जीवित कई हजार
-गुरु गोबिंद सिंह जी

अपने असंख्य पुत्रों की रक्षा हेतु
मैंने वार दिए अपने सुत चार
जिस धर्म की खातिर चार गए
उसे जीवित रखते ये हज़ार

खैर मुग़ल जिसे वंश का अंत समझ रहे थे वो कहाँ जानते थे कि गुरु गोबिंद सिंह जी तो दशमेश पिता बन चुके हैं | हर एक सिंह स्वयं गुरु गोबिंद जी का बेटा है |



गुरुद्वारा साहिब ठण्डा बुर्ज़ जहाँ माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादों को कैद करके रखा गया और यहीं माता गुजरी जी ने प्राण त्याग दिए |
गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप साहिब जहाँ माता गुजरी जी तथा छोटे साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार किया गया | यह गुरुद्वारा जिस जगह बना है वह संसार की सबसे महँगी ज़मीन है जिसे गुरु गोबिंद सिंह के अनुयायी दीवान टोडर मल ने अत्याचारी वज़ीर खां से खरीदा | जब माता गुजरी और छोटे साहिबज़ादे शहीदी पा गए तो क्रूर वज़ीर खां ने उनका संस्कार करने के लिए भी ज़मीन न दी और यह शर्त रखी की सोने के सिक्कों को खड़ा करके ज़मीन लेलो और संस्कार कर लो | तब टोडर मल जी जो गुरु गोबिंद सिंह के सच्चे अनुयायी थे, उनहोंने इस संसार की सबसे महँगी ज़मीन को बाशर्त खरीदा और माता गुज़री तथा छोटे साहिबज़ादों का अंतिम संस्कार किया | उनके गुरुधर्म पर अटल बने रहने के कारण उन्हें दीवान की उपाधि दी गई |


सरहिंद फतेहगढ़ साहिब का पुराना नाम है | बाबा फ़तेह सिंह जी के नाम पर इसका नाम फतेहगढ़ साहिब किया गया | पंजाब राज्य में फतेहगढ़ साहिब जिला है | फतेहगढ़ साहिब शहर में आने-जाने के लिए चार रास्ते हैं | चारों रास्तों पर भव्य द्वार बनाए गए हैं | इन द्वारों के नाम हैं :
1. बाबा बन्दा सिंह बहादुर द्वार (जिन्होंने मुग़लों को हरा कर फिर से सुशासन स्थापित किया)
2. दीवान टोडरमल द्वार (जिन्होंने संसार कि सबसे महंगी ज़मीन ख़रीद छोटे साहिबज़ादों और माता गुजरी जी का संस्कार किया)
3. बाबा मोती राम मेहरा द्वार (जिन्होंने ठण्डे बुर्ज़ में बंदी बनाए गए छोटे साहिबज़ादे और माता गुजरी जी को दूध पिलाने कि सेवा की और वज़ीर ख़ान ने उन्हें परिवार सहित कोहलू में पिसवा दिया)
4. नवाब शेर मुहम्मद ख़ान द्वार (जिन्होंने वज़ीर ख़ान के उकसावे में न आकर अपने भाई की मौत का बदला बच्चों से लेना उचित न समझा व उसके इस कृत्य की कड़ी निंदा की)


14 मई 1710 को वज़ीर ख़ान को उसके अत्याचारों कि कीमत चुकानी पड़ी | बन्दा सिंह बहादुर जी के नेतृत्व में सिंहो ने सरहिंद फ़तेह कर फिर से सुशासन स्थापित किया | 

हर साल 26 से 28 दिसंबर, शहीदी जोड़ मेला और 12 से 14 मई, सरहिंद फ़तेह मेला लगता है | इन्हीं मेलों के आस-पास यात्रा करें तो आपको पंजाब की अच्छी झलक देखने को मिलेगी |

चण्डीगढ़ से फतेहगढ़ साहिब लगभग 50 km दूर है | जेठ (15 मई 2017 ) महीने में की गई इस साइकिल यात्रा में गर्मी का भीषण प्रकोप रहा और बाकि की कसर SH-12A के जानलेवा ट्रैफिक ने निकाल दी | अगर इन गर्मियों में कहीं यात्रा कर रहे हों तो सुबह या शाम को ही करें, गर्मी में निकलने से बचें | हमेशा पानी का घूँट भर कर रखें इससे गला नहीं सूखेगा, साँस लेने में भी कम तकलीफ़ होगी और दिमाग़ को यह विरोधाभास रहेगा की पानी की कमी नहीं है जिससे माँसपेशियों में क्रैम्प पड़ने का अंदेशा भी कम रहेगा | शरीर पूरा ढक कर चलें लू से बचाव रहेगा | भरी गर्मी में मशक्कत करने पर सबसे  पहले पसीना आता है फिर पसीना आना बंद होता है फिर नाक बहती है इससे आगे आप बेहोश हो सकते हैं | जिस्म की स्तिथि का अंदाज़ा मूत्र के रंग से भी लगाया जा सकता है | साइकिल चलाते हुए बारी-बारी से एक टाँग से ज़ोर लगाएँ और दूसरी को रेस्ट करने दें इससे आप लगातार ज़्यादा दूरी तय कर सकते हैं | कृप्या हेडफोन लगा कर साइकिल न चलाएँ और हो सके तो साइकिल में रियर व्यू मिर्रर लगवा लें इससे बार-बार पीछे मुड़ कर देखना नहीं पड़ेगा व गर्दन को भी आराम रहेगा | बाकि रास्ते की जानकारी आपको गूगल मैप्स पर मिल जाएगी |



मैं चारे पुत्त क्यों वारे ज़रा विचारयो
जे चले ओ सरहन्द नूं मेरे प्यारओ
मेरे लालां दे नाल रेह के रात गुज़ारयो

कुछ अन्य यात्राएँ जो सिख इतिहास से सम्बन्ध रखतीं हैं :

चमकौर साहिब यात्रा

Sunday, 9 April 2017

मेजर जनरल सोमनाथ झा और उनकी अनूठी श्रद्धांजलि


अपनी पूरी सेवा देकर
सेवानिवृत होकर
अब वह चला रहा है साइकिल
उन सभी की याद में
जो सेवानिवृत न हो सके

वो चला रहा है साइकिल
पर्वत पठार मैदान में
हर उस दोस्त की याद में
जो माँ की रक्षा करते हुए
वीरगति को प्राप्त हुआ
ताकि कह सके वो खुद से
मेरे दोस्त मैं तुझे भूला नहीं

वो चला रहा है साइकिल
भारत माँ के सम्पूर्ण विस्तार में
ताकि कह सके शहीदों के परिवार से
बलिदान व्यर्थ गया नहीं


क्या होंसला लिए चलता है वो
साथ रूहों का लिए चलता है वो
अपने दोस्तों को लिए चलता है वो
पर ज़माने की निगाहों में अभी तलक अकेला है


गोली लगी होगी जब उसे
इक पल को शायद आहत हुआ होगा
पर दूसरे ही पल उसने भारत माँ के
दुश्मन पर वार किया होगा
और उसका अमर बलिदान
जो हमने भुला दिया
मेजर जनरल सोमनाथ झा को देख कर
कुछ वतन परस्तों ने तो याद किया होगा


अनुशासन, सेवा, बलिदान, त्याग, शक्ति, साहस, सम्मान ऐसे शब्द कान में पड़ते ही, स्वतः ही एक फ़ौजी की तस्वीर ज़ेहन में बन जाती है | वही फ़ौजी जो सीमा पर तैनात है, एकदम चौकस ताकि पूरा देश चैन से सो सके | आज़ादी के बाद से 21000 फ़ौजी शहीद हो चुके हैं | किसे याद है? कौन ध्यान देता है ? हमको तो बस वो पेट्रोल पम्प दिखता है जिसपे शहीद का नाम लिखा है | और आज एक सेवानिवृत फ़ौजी ने यह बेड़ा उठाया है कि पूरे देश को बता दिया जाए कि तुम बेशक भूल गए लेकिन वो नहीं भूला अपने उन सभी दोस्तों को जो लौट के घर न आए.............


मेजर जनरल सोमनाथ झा 30 सितम्बर 2016 को रिटायर हुए और 18 दिन बाद 19 अक्तुबर को साइकिल पर सवार होकर निकल पड़े उन सभी 21000 शहीदों को श्रद्धांजलि देने जो रिटायर न हो सके। मेजर जनरल सोमनाथ जी हर जवान के लिए 2 मिनट साइकिल चला रहे हैं। ये उनकी तरफ से श्रद्धांजलि है हर उस शहीद के नाम जो देश के लिए सर्वस्व न्योछावर कर गया । 21000 शहीदों को श्रद्धांजलि देने के लिए 42000 मिनट की उनकी यात्रा अब लगभग आखिरी पड़ाव में है जो 19 अप्रैल को अमर जवान ज्योति पर ख़त्म होगी। देश के सभी राज्यों से गुजरते हुए मेजर जनरल सोमनाथ झा लगभग 12000 Km का सफर तय करेंगे । मेजर जनरल सोमनाथ झा अब तक 173 दिनों में 10,230 Km साइकिल चला चुके हैं | 


अपने 37 साल के सैन्य अनुभव में उन्होंने न जाने कितने दोस्तों को बिछुड़ते देखा । उन्हीं सभी की याद में वे साइकिल चला रहे हैं । मेजर जनरल सोमनाथ झा कि इस यात्रा में उनका भरपूर साथ निभा रहीं हैं उनकी पत्नी लेखिका चित्रा झा जी | वे खाने-पीने से लेकर सोशल मीडिया पर यात्रा अपडेट्स और यात्रा के रास्ते का चुनाव, सब मैनेज करतीं हैं | गौरतलब है कि ये पति-पत्नी अपना सब कुछ दान में दे चुके हैं और इनके पास अपना घर तक नहीं है |


आज पूरे देश को उन्होंने शहीदों का वो परम बलिदान याद दिला दिया "लेकिन", असल बात इस लेकिन से ही शुरू होगी कि हम लोग कितने भुलक्कड़ हैं | हमें उन शहीदों का बलिदान याद दिलाने के लिए एक सेनानिवृत फौजी साइकिल चला रहा है । अधिकतर लोग तो बस ये कह के पल्ला झाड़ लेंगे की ये उनका व्यक्तिगत श्रद्धांजलि उद्देश्य है, उनको तो बस अपने शहीद दोस्तों को याद करना था तो साइकिल चला रहे हैं लेकिन, बात जब शहादत की हो तो मामला व्यक्तिगत कहाँ रह जाता है | ज़रा सोचो ! और गहरा सोचो ! आज तुम साक्षात् सच देखो, तप देखो, बल देखो जो सीना चौड़ा करके साइकिल पर जा रहा है। 


इक सवाल पूछा मुझसे मेजर जनरल सोमनाथ झा की आँखों ने
की तुम्हारे अंदर क्या अब तक आत्मसम्मान ज़िंदा है
फिर क्यों कर्ज़ उनका तुमने भूला दिया
क्या गैरत का कतरा भी अभी तक
तुम्हारे अंदर ज़िंदा है
और ऐश करते कितनी मर्तबा याद आये वो सभी
जिनकी शहादत से अभी तक
ये ज़माना जिन्दा है
और मेरी आँखें जो मिली हुईं थीं उनसे
झुक गई शर्म से
की मैं तो मुर्दा लाश हूँ इस ज़माने की तरह
बस मेरी ये टूटी कलम जिन्दा है
और आज जो कुछ भी हूँ मैं लिख रहा
सोचना तुम यही की वो हर शहीद ज़िंदा है


आज मुझे प्रेरणा का सागर दिख गया साक्षात्
इक फौजी जो गुजरा है साइकिल पे
मेरी बगल से

अक्सर लोग उसे अकेला ही देखते हैं
लेकिन आज साथ जो देखा रूहों का
जब गुज़रा मैं उनकी बगल से


सलाम है तुमको और तुम्हारे जज़्बे को
ये मकसद तुम्हारा जो बस सिर्फ तुम्हारा न रहा
की है यही मकसद असली हर देशप्रेमी का
की सम्मान हो, इन्साफ हो और सबको याद हो
बलिदान शहीद हर फौजी का


मेरे रहनुमा पाठ सच्ची दोस्ती, सच्ची देशभक्ति, सच्ची श्रद्धांजलि का
खूब पढ़ाया तुमने
बहुत धन्य हूँ मैं की
मेजर जनरल सोमनाथ झा से मिलाया तुमने

शहादत नाम है किसका बता दिया तुमने
और सम्मान नाम है किसका
ये दिखा दिया तुमने

की बहुत छोटा हूँ मैं
बहुत छोटा मेरा साथ रहा
और
मेरी कलम बहुत बौनी है
आपके मकसद के आगे

लेकिन शहीद उस हर फौजी की ललकार
मेरे शब्दों में जिन्दा है
की चले थे तुम जिन दोस्तों की याद में
दोस्त वो सब आपके
मेरे शब्दों में जिंदा हैं
और भूल गया चाहे सारा देश
उस शहीद को
मेरे दोस्त का हर वो पिता
मेरे लफ़्ज़ों में जिंदा है


भूल चुके थे हम
और शायद कल फिर से
भूल जाएँगे
लेकिन शहीदों की मज़ारों पर लगे थे जिस बरस मेले
उस बरस मेजर जनरल सोमनाथ जी
साइकिल से आए थे


मेजर जनरल सोमनाथ झा की इस पवित्र साहसिक यात्रा में हर वतन परस्त के लिए एक सवाल है। आखिर क्यों हमें भूल गया उनका बलिदान ? शायद, इस देश ने अब वो सम्मान, साहस वो बलिदान भावना वो तेज़ वो प्रताप सब भुला दिया है ।

मेरे गांव से,वो चला तो गया
साइकिल पर सवार होकर
पर एक सवाल छोड़ गया
की शहीदों की शहादत
क्या अब भी ज़िंदा है

और टटोल कर ज़ेहन अपना
सोचना जवाब जरूर
की तुम्हारे अंदर का वो देशभक्त
कितना ज़िंदा है


एक बात जो मेरे ज़ेहन में आ रही है वो यह की सीमा पर शहीद होते हुए एक फौजी के ज़ेहन में क्या चल रहा होगा ?? तुम भी सोचो और तुम भी जान जाओगे की मेजर जनरल सोमनाथ झा क्यों साइकिल से पूरे देश की यात्रा कर रहे हैं | शायद, तब तुम्हें समझ आ जाए मकसद क्या चीज़ होती है..... 
ज़रा अकेले में गहरी सोच विचारना मामला बहुत संजीदा है।


मेरे रहनुमा आज क्या खूब सबक मुझे सिखाया
न भूलूँगा कभी बलिदान हर रूह-ऐ-शहीद का

उन्हीं सभी शहीद रूहों के नाम....................................

Wednesday, 5 April 2017

मण्डी की शिवरात्रि (व्यावहारिक ज्ञान)

दसवीं और ग्याहरवीं सदी के मध्य में कुल्लू, काँगड़ा और सुकेत के सीमावर्ती दूरदराज क्षेत्र में मण्डी नामक छोटे से कसबे का जन्म हुआ | सोहलवीं सदी तक आते आते ये एक शक्तिशाली राज्य के रूप में विकसित हुआ | राजा अजबर सेन ने ब्यास नदी के दूसरी तरफ के इलाके जीत कर वहाँ एक शहर बसाया जिसे आप आज की मण्डी के रूप में देख सकते हैं | सबसे पहले भूतनाथ मंदिर का निर्माण किया गया फिर राजमहल बनाया गया | सन 1648, राजा सूर्य सेन ने, जिन्होंने आपने 18 पुत्रों को अपने जीवन काल में मरते देखा, मण्डी की रियासत को ऐसे महाराजा के अधीन कर दिया जो समय से परे है, जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्त है | माधोराय, भगवान श्री कृष्ण की चाँदी की प्रतिमा को मण्डी का सारा कार्यभार सौंप दिया गया और उनके अधीन ही अगले उत्तराधिकारी राज करते रहे |  खैर, इसका एक असर ये भी हुआ की मण्डी की शिवरात्रि जो पहले केवल धार्मिक महत्व की थी अब उसका राजनीतिकरण भी हो गया | आज भी माधोराय शिवरात्रि मेले के पहले दिन भूतनाथ जी के मंदिर में जाकर पूजा करते हैं | पूजा संपन्न होने के बाद माधोराय आये हुए सभी देवतों से मिलते हैं | मिलने का क्रम पहले से तय है | सबसे पहले पराशर ऋषि जी से मिलन होता है | 2017 की इस शिवरात्रि में पराशर ऋषि जी का 22 साल बाद आगमन हुआ | 



(पहला गीत)

(1)
हो उच्याँ पाडाँ पर
हो उच्याँ पाडाँ देवते जे बसे ने
हो कुन्नि वो
हो कुन्नि वो ठकाने इन्हां जो दसे ने
इन्हां जो दसे ने

हो ऊँचे
हाँ ऊँचे पहाड़ों पर देवतों का राज हैं
किसने हो
हाँ किसने किया इनको यहाँ विराजमान है
किया विराजमान है

हिमालय की चोटियों के नाम हों या वहाँ बसने वाले गाँव कस्बों के नाम आपको हर जगह देवते मिल ही जायेंगे | उदहारण के लिए मंडी का नाम ही ले लीजिए जो कि ऋषि मांडव के नाम पर रखा गया है | अक्सर मैं सोचता हूँ कि किसने ऋषि मुनियों को हिमालय कि राह दिखाई होगी, किसने इतने सारे देवी-देवताओं को पहाड़ों कि चोटियों पर विराजमान किया, किसने पांडवों को स्वर्ग का राह बताया, किसने बीहड़ों में ऐसे भव्य मंदिर बनवाए | आखिर क्या चीज़ है जो भटकते मन को स्वतः ही पहाड़ों की ओर खींच लाती है |  

(2)
हो फागण महीने दी हो फागण महीने दी
रात तेरवीं आयी चली है
सादा जे आया तयारी पूरी चली है
तयारी पूरी चली है

फागुन मास की हो फागुन मास की
रात तेरहरवीं आने वाली है
न्योता भी आ गया है तैयारी भी होने वाली है
होने वाली है

आस-पास के सभी देवी-देवतों को शिवरात्रि मेले में आगमन के लिए न्योता भेजा जाता है | कुछ आते हैं कुछ नहीं आते | पुराने समय में ये सीमाओं का निर्धारण करने का भी एक तरीका था |  

(3)
हो तान जे
हो तान जे बसुदिया दी लम्मी लम्मी लायी ऐ
हो चोट जे
हो चोट जे नगाड़े की निग्गर जे बायी है
निग्गर बायी है

तान लंबी वाद्य यंत्रों की जैसे लंबी आवाज़ लगाई है
और आवाज़ नगाड़ों की कितनी ज़ोर से आयी है
 ज़ोर से आयी है

देवते के वाद्य वादक या बजंतरी देवते के वाद्य यंत्रों को जोर-शोर से बजाते हैं | ताकि सभी को पता चल जाए देवता आने वाला है | 

(4)
हो पालकी जे
हो पालकी जे बाँकी देवते दी शिंगारी है
हो कुत्थु ओ हाँ कुत्थु ओ
हो कुत्थु ओ जाना कुदरे दी तैयारी है
कुदरे दी तैयारी है

पालकी ये निराली कितनी सुन्दर श्रृंगारी है
किधर को हाँ कहाँ को
किधर है जाना किधर की तैयारी है
किधर की तैयारी है



(5)
हो पालकी जे डोलदी नच्ची चली है
मंडिया शिवरात्र हो मंडिया शिवरात्र
मंडिया शिवरात्र गई लग्गी है
गई लग्गी है

पालकी ये हाँ पालकी ये
नाचती डोलती चली है
मण्डी में शिवरात्रि
मण्डी में शिवरात्रि शुरू होने लगी है
शुरू होने लगी है

(6)
हो पाड़ बड़ा करड़ा
हो पाड़ बड़ा करड़ा रख निगाह मालका
हो जाना वो हो जाना वो
हो जाना वो मंडिया दे दम मालका
दे दम मालका

ये पहाड़ी रास्ता है मुश्किल
ये रास्ता है मुश्किल ध्यान रखना भगवान
और मण्डी तक जाना है
होंसला भी पूरा रखना भगवान

(7)
हो पड्डल मैदाना च
हो पड्डल मैदाना च देवते विराजे ने
ओआरे पारे दे ओआरे पारे दे मिले
बजे गाजे बाजे ने बजे गाजे बाजे ने
गाजे बाजे ने

हो पड्डल मैदान में देवते विराजे हैं
देवते विराजे हैं
इस पार के उस पार से मिले
जोर-शोर से बजे
पुरे जोर से बजे बाजे हैं
बजे बाजे हैं



सभी देवते पड्डल मैदान में एकत्रित होते हैं | अक्सर कुछ देव व्यास नदी के इस पार तो कुछ उस पार विराजते हैं | ये समय केवल उनके ही नहीं बल्कि सामाजिक मिलन का भी है |



(8)
हो बखरे जे बज्जे बाजे बखरी धुन बज्जि है
हो इक दिन पहले ही बड़ा देव गया पुज्जी है
गया पुज्जी है
हो माधो राय ने हो माधो राय ने
हो माधो राय ने बड़ा देव गया मिली है
हो टारना जे
हो टारना जे बैठा पूरी मण्डी दिखी है
पूरी शिवरात्र दिखी है
शिवरात्र दिखी है

अलग ही धुन सुनाई दी
अलग ही धुन बजी है
एक दिन पूर्व बड़े देव का आगमन हुआ
देव कमरुनाग का राजा माधोराय से मिलन हुआ
फिर इजाज़त ले वो टारना की पहाड़ी पे चले गए
वहीँ से फिर पूरी मण्डी शिवरात्रि का दिव्यदर्शन हुआ
शिवरात्रि का दिव्यदर्शन किया 


पुरे राज्य के बारिश के देवता कमरुनाग हैं | इनका आगमन सबसे पहले होता है और इनके वाद्य यंत्रों की धुन शिवरात्रि में आये सभी देवतों की धुन से अलग होती है इसलिए इनको कोई भी आसानी से पहचान लेता है | बड़े देव कमरुनाग की कोई पालकी नहीं आती, बस एक देवचिन्ह आता है | बड़े देव भूतनाथ जी से आशीर्वाद और माधोराय जी से मिलने के बाद टारना की पहाड़ी पर बने श्यामाकाली के मंदिर में विराजमान होते हैं | ये मंदिर नीचे बाजार से 2 km ऊपर पहाड़ी की चोटी पर है | बड़े देव कमरुनाग यहाँ बैठ कर शिवरात्रि की तमाम गतिविधियों पर नज़र रखते हैं |


एक समय था जब शिवरात्रि का मेला केवल राजपरिवार के सदस्य ही देखते थे | फिर सन 1664 में पहली शिवरात्रि हुई जिसमें आम जनता ने भाग लिया | आज़ादी के बाद भी कुछ बदलाव किये गए | पहले केवल दो जलेब होती थीं (जलेब = देवतों का भक्तों के साथ सामूहिक रूप से चलना ) एक शुरुआत में और एक अंत में | आज़ादी के बाद एक मध्यम जलेब का प्रचलन शुरू किया गया | आज जलेब पड्डल ग्राउंड से राजमहल में बने माधोराय जी के मंदिर तक जाती है और ये क्रम मेले के सात दिनों में तीन बार दोहराया जाता है | हज़ारों की संख्या में भक्त देवतों की पालकियों के पीछे चलते हुए, नाचते झूमते हुए जाते हैं |









दूसरा गीत 

(1)
पालकी डोला दी है 
पालकी चुला दी है 
पालकी सुणा दी है 
इक इक दिले दी 

पालकी डोल रही है
पालकी झूल रही है
पालकी सुन रही है 
एक-एक दिल की 

(2)
पालकी ऐ पालकी 
पालकी ऐ पालकी
देवते की इक दुए कन्ने
चुकी चुकी मिला दी है

पालकी ये पालकी 
पालकी ये पालकी 
देवों को आपस में 
झुक-झुक मिला रही है

(3)
पालकी ऐ पालकी 
बड़ी दुरे आयी है 
पड्डल ते जलेब चली
राजमहल आयी है 

पालकी ये पालकी
बड़ी दूर से आयी है
पड्डल से जलेब चली 
राजमहल तक आयी है

(4)
पालकी ऐ पालकी 
पालकी ऐ पालकी 
पलकिया आगे अज नगाड़ा जे बजया
रणसीघे बसुदीया दी भी तान लम्मी लाई ऐ

पालकी ये पालकी 
पालकी ये पालकी 
पालकी के आगे नगाड़े अज बजे हैं 
रणसिंघे, विशुधि के सुर लंबे लगे हैं 

(5)
पालकी ऐ पालकी 
सजी धजी चली ऐ जी 
पालकी ऐ पालकी 
गज्जी-बज्जी चली ऐ 

पालकी ये पालकी 
सुन्दर तैयार हो चली है 
पालकी ये पालकी 
मनभाती हुई चली है 

(6)
पालकी ऐ पालकी
रली-मिली चली ऐ 
पालकी ऐ पालकी 
खेली-खेली चली ऐ

पालकी ये पालकी 
इक्कठी हों चली हैं
पालकी ये पालकी 
देवते के वश में हों चली हैं

(7)  
पालकी ऐ पालकी 
देवते दी आयी है 
सुख सान सारी जलेबा दी
देवते पता लाई है 

पालकी ये पालकी 
देवते की आयी है
सबके सुख-दुःख 
देवते को बताई है 

(8)
देवता ऐ देवता 
ऐ हाल सारा जाँणदा
हाल सारा जाँणदा
हर इक दिले की ऐ 
खरी खरी पछाँणदा 

देवता ये देवता 
ये हाल सारा जानते 
हर एक बन्दे कि ये
रग-रग जानते 

(9)
बन्दया ओ बन्दया 
तू छड़ी दे चलाकी हुण
अन्दरे दी सारियाँ
देवता है जाँणदा
भेद सारा जाँणदा

बन्दया ओ बन्दया 
तुम छोड़ दो चालाकी अब 
अंदर की सारी देवता है जानता 
सब कुछ जानता 
भेद पूरा जानता 

(10)
पालकी ओ पालकी 
पालकी ओ पालकी 
तू निगाह खरी रख्याँ
राजी बाजी सारयाँ की 
सारयाँ जो खुश रख्याँ
सारयाँ जो खुश रख्याँ 

पालकी ओ पालकी
पालकी ओ पालकी  
तू दया दृष्टि रखना  
सबको सुख देना
सबको खुश रखना
सबको खुश रखना
  

एक बड़ा ही मनोरम दृश्य है देव मिलन का | दोनों देवते आमने सामने आते हैं, दोनों की पालकियाँ एक दूसरे की ओर झुकती हैं जैसे गले मिल रहे हों फिर वापिस सीधी हो दूसरी ओर से देव फिर गले मिलते हैं | इस दौरान बजंतरी पूरे ज़ोरों-शोरों से वाद्य बजाते हैं | पारंपरिक देवधुनों पर झूमते देव और उनके गण बहुत ही उत्साह से शिवतरात्रि उत्सव मानते हैं |


शिवरात्रि मेले की प्रत्येक संध्या पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता है | आमतौर पर एक पंजाबी सिंगर को ही इस पावन अवसर पर गाने का मौका दिया जाता है | पहाड़ी कलाकार दूर किसी पहाड़ी पर बैठा डीजे की ऊँची आवाज़ में सुनाई दे रहे पंजाबी गानों को सुनता होगा और सोचता होगा की "बुरा ज़माना आई गया" |



इस लेख में दी गई अधिकतर जानकारी गुरूजी की वेबसाइट से ली गयी है | दोनों गीत मेरी अपनी रिसर्च और अनुभव पर आधारित हैं | आपके बदलाव, सुझाव एवं प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है | 


   

Friday, 31 March 2017

मण्डी की शिवरात्रि (आलोचनात्मक दृष्टि)

मण्डी की शिवरात्रि, सुनते ही दिलोदिमाग में पालकियों पर झूमते देवताओं की एक छवि सी बन जाती है | पारम्परिक वाद्य यंत्रों के स्वर स्वतः ही दिमाग में गूँजने लगते हैं | इसी सांस्कृतिक देव मिलन को देखने मैं भी चंडीगढ़ से पहुँच गया मण्डी, सीधा गुरूजी के घर में | आज पहला दिन है, नहा-धो के मैंने अपने आप को पवित्र किया, सोच रहा था शायद देवतों के सामने बिना नहाए जाऊँगा तो पाप लगेगा | सुबह हम दोनों पहुँचे पड्डल मैदान में, बसस्टैंड के सामने | यहाँ बड़े-बड़े शेड बनाए गए हैं, जिनमें बहुत सारी दुकाने लगी हैं | सामने ही मंच है, पर देवते ! वो कहीं नज़र नहीं आ रहे | ये मैदान पार किया, पूरे मेले की चकाचौंध देखी | सुई से लेकर गाड़ी सब कुछ बिक रहा है | सामने ही एक और छोटा मैदान है | जैसे-जैसे हम करीब जाते जा रहे हैं, पारम्परिक वाद्य जैसे नगाड़े, पीपनी (शहनाई), बिशुदी, रणसिंघे, चिमटा, थाली आदि की आवाज़ तेज़ होती जा रही है | मैदान में दाखिल हुए तो देखता हूँ, पालकियाँ ही पालकियाँ, देवते ही देवते | बहुत सारे देवते आ चुके हैं, बहुत सारे आ रहे हैं लेकिन ये नज़ारा वैसा नहीं है जैसी छवि मैंने अपने दिमाग में बना रखी थी | अब जब लिखने बैठा हूँ तो सोचता हूँ सबसे पहले कुछ कटु अनुभव ही लिख दिए जाएँ | शायद बाद में जो लिखूँ कम से कम उसमें ये कड़वाहट न आए |

दसणी ऐ गल्ल सच्ची 
राज कोई नी रखणा
सच जे गलाणा लग्गां
ओला कोई नी रखणा
ओ मोयो बजुर्गो 
तुसाँ बड़ी तौली चली गए
मानोनंदा था मेला कियाँ
अज कुनी मिंजो दसणा 
पुलियाँ जवानियाँ की 
रा कुनी दसणा

(आज सच्ची बात बताई जाएगी 
कोई राज नहीं रखा जाएगा 
सच कहने लगा हूँ 
कोई पर्दा नहीं रखा जाएगा 
हे! बड़े-बुजुर्गो
आप बहुत जल्दी चले गए 
शिवरात्रि का मेला होता था कैसे 
अब कौन मुझे बताएगा 
भटकी हुई जवानियों को 
राह कौन दिखायेगा)


सन्तरी भी मंत्रियाँ कन्ने
स्टेजा पर चढाई दित्ते 
जो जहान दे चेले-चाँटे
कुर्सियां पर बठाई दित्ते
देवत्यां दे आसन अज 
पुईयाँ ही लोआई दित्ते
देवते सड़न धूपा
कुन्नी लेणी सुख सान ऐ 
सरकारी पंडाले च लग्गी 
सौ-सौ दूकान ऐ
देवते दा ठकाणा अज
खुल्ला असमान है
मंडी दी शिवरात्रिया च
देवतयाँ दा बुरा हाल है

(संतरियों के साथ मंत्री 
मंच पर चढ़ा दिए गए 
सारे चमचे भी
कुर्सियों पर बैठा दिए गए 
और देवतों के आसन आज 
नीचे ही लगवा दिए गए 
देवते सड़ रहे धूप में
किसको ख्याल है 
सरकारी पंडाल में लगी
सौ-सौ दूकान है
देवते का ठिकाना मगर 
खुला आसमान है 
मंडी की शिवरात्रि में 
देवतों का बुरा हाल है) 


बोतल रे गई ठेके 
नोए गीत लग्गे बजणा 
नशर होए सब  
लोक लग्गे नचणा  
देवते दे राग
अज सारे पुलाई दित्ते
लुधियाने दे लयोंदे कपड़े
देवते की लुआई दित्ते
बोल्दा जे देवता अप्पू
तां हुक्म असली पता लगणा   
गुर जे खोटा होए
तां सच कुन्नी दसणा  

(बोतल रे गई ठेके (बोतल ठेके पर रेह गई, एक गीत के बोल)
नए गीत लगे बजने
नशे में धुत्त सब 
लोग लगे नचने
देवते के राग
आज सभी भूल चले
और लुधियाने के कपड़ों में 
देवते को लपेट चले
देवता जो बोलता खुद
तो असली हुक्म पता चलता 
पुजारी ही अगर झूठा हो 
फिर सच किसे है पता चलता) 


मंडिया दी शिवरात्रि च 
खोदल मची चली ऐ 
सारे फुल चढ़ान जिसकी
ऐ जलेब कुदी चली ऐ
ओहो पाई 
ऐ तां लाल बत्ती चली ऐ 
मंत्रीए पीछे चेल्यां दी 
पीड़ बुरी चली ऐ 

लाल बत्तीए दी राआ च 
देवते जे आयी गए 
धक्के मारी-मारी बने कित्ते
बखिया नसाई ते
माधो राय ने पहले मिल्या मंत्री 
फिरि देवत्यां दी बारी आयी ऐ 
पुलसा जे दबके मारी-मारी 
जलेब बने लायी ऐ      
मजाल ऐ की कोई पुलसाआला 
संतरिये की हाथ लाइ दे 
मंत्री की गलाई के से 
तिद्दी बदली न कराई दे  

(मंडी की शिवरात्रि में 
हल-चल मच गई है
सारे फूल चढ़ाएँ जिसे
ये किसकी पालकी चली है 
अरे ध्यान से तो देखो
ये तो लाल बत्ती चली है
मंत्री के पीछे संतरियों की 
रेल पूरी चली है

अब लाल बत्ती के रास्ते में
देवते जो आ गए
धक्के मार-मार हटाए गए
कोने में पहुँचा गए
माधो राय जी से सबसे पहले मंत्री मिला 
फिर कहीं देवतों का नंबर आया 
पुलिस ने डरा-धमका 
मंत्री का रास्ता बनाया 
और पुलिस की क्या मजाल
जो किसी सन्तरी को हो हड़काया
सन्तरी बोल मंत्री को 
उसे पांगी न पहुँचा दे
एक फोन से उसकी 
बदली न करवा दे)


साबां दे साब न 
बड़े-बड़े साब न
सबते ऊपर तां
मंत्री विराजमान न
काम जे कराणा होए
देवते की कुण पुछदा
चढ़ावा तां असली 
मंत्रीए दे दर चढ़दा
तांहि अज देवते 
मिट्टिया च बठैली दित्ते
मंत्री सणे सन्तरी
स्टेजा पर चढ़ाई दित्ते
शिवरात्र तां बाना बस
पुरे साले दा डंग बणदा  
मेकमा कुण जड़ा
सब्तों बड़ा ककड़ फड़दा

(साहबों के साहब हैं 
बड़े-बड़े साहब हैं 
सबसे ऊपर तो 
मंत्री साहब हैं
काम कोई निकलवाना हो 
तो देवते के पास कोई क्यों जाए 
चढ़ावा वो असली 
मंत्री के दर पे चढ़ाए
तभी देवते धूलि-धूसर 
मंत्री मंच पर विराजमान है
शिवरात्रि तो बस बहाना है 
पैसा पुरे साल का खाना है 
कौनसा महकमा कितना पैसा खाता है 
देखते हैं 
सबसे बड़ी मछली कौन पकड़ पाता है)