Friday, 3 March 2017

बाबा बन्दा सिंह बहादुर की याद में, मैदान-ए-जंग चपड़ चिड़ि, मोहाली, पंजाब


मैं तो बहुत व्यस्त हूँ
सांसारिक क्रियाकलापों में मस्त हूँ 
और आप तो हर जगह
फिर काहे आपको ढूंढने
निकलूँ हर जगह
बहुत मज़ा मुझको है आ रहा 
फिर भी जाने क्यों 
मन तेरी है सुन पा रहा
थोड़ी देर के लिए सही
जैसे पहले ग़ुम थे
वैसे ही हो जाओ 
ऐ मन माया में लिप्त हो जाओ 
लेकिन हक़ असल की ना 
जोत जगाओ
ये जोत शुद्ध घी ज्वाला 
जो सब कुछ खा जाए
पर्दा सच झूठ का 
साफ़ नज़र आए

हे! मेरे रहनुमा 
मैं क्या करूँ
तू ही सच्ची राह दिखा 
जिस पे चलूँ
मैं क्या करूँ

कहाँ जाऊँ
हर जगह ही तुम हो
जब थक जाता हूँ 
तब दिखते तुम हो
अच्छा तुम ही बताओ
कहाँ क्या है 
राह कौन सी की 
सीधा तुम्हें पाऊँ
घुमंतू इस मन से 
पीछा छुड़ाऊँ
आखिर कहाँ जाऊँ

हाँजी भाईसाहब
महीना होने को आया
कहीं गए नहीं

मेरे रहनुमा 
तुम नहीं कहाँ
खैर 
तुम तो हो हर जगह
जीवन के सम्पूर्ण अनुभव
और तुम्हारा अनुभव 
तौला गया सोना कहाँ 
धूल से भला
मेरे रहनुमा 
तू ही कोई उपाए सुझा    

मेरे रहनुमा
तेरे सवाल का जवाब तो मेरे पास नहीं
ख़राब साइकिल का पहला बहाना ही सही
या छुपा लूँ मैं आलस अपना व्यस्तता का दूसरा सुना
या शारीरिक कमजोरी का तीसरा बता
दवाई की ख़ाली डिब्बी दिखा
मेरे रहनुमा
अब तू ही कोई राह दिखा

हाँ भाई
कितना आसान है
हार मान लेना
बहाना बना लेना
दोष दूसरे पे डाल देना
जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लेना

अच्छा रुक
एक कहानी सुनाता हूँ
तुझे सोये से जगाता हूँ


ध्यान से सुनना:

सिखों के इतिहास की
बता रहा हूँ एक वीर कहानी
जब मुग़लों ने अत्याचार कर
धर्म की दुर्दशा थी कर डाली
तब गुरु गोबिंद सिंह ने
दक्षिण की तरफ़ डेरा डाला
वैरागी एक ध्यान में आया बोलाबाला
गोदावरी किनारे सोच विचारी
दिखा एक मनुष्य साहसी अहँकारी
जो था अंदर से बलशाली
लेकिन सच्चे फूल से अनभिज्ञ 
था वो माली
सभी सूरतों ने एक दूसरे की
सूरत देखी
गुरु ने शिष्य की
मूरत देखी  
धर्म की रक्षा कर जिसने
अमर अपना नाम किया
गुरु वचन का निर्वाह किया

पैदल चलता हुआ 
सोच रहा हूँ
इतिहास की परतें 
खोल रहा हूँ
जब गुरु गोबिंद सिंह 
गए दक्षिण
शायद जानते थे 
अगला बन्दा मिलेगा वहीँ
शायद जानते थे 
जब मिला वो बन्दा
तो दोनों धन्य थे हुए
एक दूसरे की इच्छ्या के 
दोनों आदि शक्ति के 
पूरक थे हुए
और वो बन्दा भी क्या 
बन्दा निकला
गीदड़ों में छुपा
वो सिंह निकला

27  अकतूबर सन 1670

पुँछ की राजौरी में
किसान राम देव के घर में
लछमण देव ने जन्म लिया
लड़कपन से ही जिसने
शिकार के खेल को साध लिया

एक बार उसने एक हिरणी का शिकार था किया
प्राण त्यागते ही जिसने बच्चों को जन्म था दिया
आघात इस बात का उसके ह्रदय पर था हुआ
पश्चाताप में वह संसार से विरक्त था हुआ
वैरागी जानकी प्रसाद का शिष्य था बना
तभी लछमण देव से माधो दास नाम था हुआ

साधु राम दास से घुम्मकड़ी सीखी
योगी औघड़ नाथ से कला योग
गोदावरी किनारे चलते-चलते
जा बसा नंदेड़

सन 1708

मिला जब वो गुरु गोबिंद से
अज्ञान दूर था हुआ
कर्मयोगी को कर्म का
आदेश था हुआ
बना वो बन्दा गुरु का
पर गुरु ने बन्दा सिंह था किया

पाँच तीर नगाड़ा, निशान था दिया
और बन्दा सिंह से
बन्दा सिंह बहादुर बना था दिया
आज्ञा पा गुरु की
पंजाब को चला

कुछ ही समय बाद उसे
गुरु के ज्योतिजोत सामने का
समाचार उसे मिला
सिरहिंद के पठान के
विश्वासघात का पता चला

बन्दा सिंह बहादुर बना
मज़लूमों की सहायता करने को
अन्याय से लड़ने को
धर्म पर चलने को
गुरु के उद्देश्य का
उनके बाद भी पालन किया
और उनके जाने की ख़बर ने
इरादों को और मज़बूत बना दिया

पहले जीता सोनीपत
फिर बांटा समाना कैथल का खज़ाना
नज़र तो बन्दा सिंह बहादुर की सिरहिंद पर थी
पर अभी सेना को और शसक्त जो था बनाना
ऐसा चला सिंहो का विजय अभियान
जीत लिए घुरम थसका शाहबाद और मुस्तफाबाद
सिरहिंद न था अब बहुत दूर
कब्ज़े में लिए कपूरी सढ़ौरा और बनूर

बन्दा सिंह बहादुर की सेना को और शसक्त करने को
माझे और दोआबे के सिंह भी आये धर्म के लिए लड़ने को
खरड़ और बनूर के बीच सिंहो का मेल था हुआ
सिंहासन वज़ीर ख़ान का डांवांडोल था हुआ


चपड़ चिड़ि की लड़ाई :

वज़ीर खान थर-थर काँप था गया
तभी कूटनीति का उसने सहारा था लिया
सुचानंद के भतीजे को
बंदा को कमज़ोर करने को
हज़ार सिपाही देकर
बंदा सिंह की तरफ़ भेज था दिया
जिसने बगावत का झूठा ढोंग
बखूबी था किया

वज़ीर खान सिरहिंद का 
था बड़ा अहंकारी 
थी छल कपट से उसने हमेशा 
बाजी मारी
इस बार भी उसने 
रावल पिंडी संदेसा भिजवाया 
कहा मुस्लिम धर्म पर है 
संकट आया
तुम आओ फ़ौज लेकर 
काफ़िर को हराओ
अल्लाह का तुम 
हुक्म बजाओ
देखो कब से ये जंतर चलता आया 
धर्म  का सहारा ले इंसान लड़ाया 
खैर
अब तो समस्त भारत है 
इसने मार गिराया 
वज़ीर खान का अस्त्र
सियासत ने अपनाया

पर बन्दा सिंह बहादुर
मुग़ल फ़ितरत से कहाँ महरूम था
उसे अपने गुरुओं के साथ हुए विश्वासघातों का 
पूरा इतिहास मालूम था
हम सब जागें तो बन्दे का संकल्प पूरा हो 
धर्म से उठें तो वतन पूरा हो 

उस तरफ़ थे हाथी घोड़े तोपें
जो बड़ी तादात में इकट्ठी हुईं
और बंदूकों की गिनती 
अनगिणत हुई 
इस तरफ़ टूटे भाले
और तलवारें लड़-लड़ के 
धारहीन थीं हुईं

लड़ाई शुरू हुई
चपड़ चिड़ि के मैदानों में
मुग़ल सेना आश्वस्त थी बहुत
वज़ीर खान को विश्वास था बहुत
अपनी कूटनीति चालों में
जब भागा वो गद्दार
सिंह भी थे कुछ घबराए
लेकिन फिर बन्दा सिंह बहादुर
मैदान-ए-जंग में खुद चले आए


होंसला बुलंद हुआ सिंहों का
वाहेगुरु जी की फ़तेह के जयकारे लगाए

होंसले, विश्वास से भरपूर सिंहों ने फिर
बड़ी बहादुरी से लड़ाई लड़ी
मुग़ल सेना की बुरी हालात थी हुई
देख कर ये वज़ीर खान था घबराया
और बर्छे से बाज़ सिंह को मारने था आया
सिंह ने उसी का बर्छा उससे छीना उसी से
उसके घोड़े को मार गिराया
फिर चलाया तीर  वज़ीर खान ने
बाज़ सिंह के बाजु को निशाना बनाया
और तलवार निकाल अपनी
निहत्थे का सामना करने को आया
फ़तेह सिंह ने देखा ये दृश्य
वो पास ही था खड़ा
बाज़ सिंह की रक्षा करने को आगे बढ़ा
वार करने को आते वज़ीर खान के
सारे होंसले पस्त कर दिए
एक ही वार में उसके
दो टुकड़े कर दिए
वज़ीर खान के मरने की देर थी
मुग़ल सेना बिना नायक के
भटकते लोगों का ढ़ेर थी
और दहाड़ते सिंहों के आगे
जैसे लाचार भेड़ थी

जीता सिरहिंद बन्दा सिंह बहादुर ने
जहाँ गुरु गोबिंद के बच्चे चिनवा थे दिए
किया फ़तेह वो बुर्ज
जहाँ माता गुजरी ने प्राण
त्याग थे दिए
आज सूबा-ए-सिरहिंद पर
धर्म के परचम लहरा थे दिए



हाँ भाई
कहो कैसी रही
जी बहुत खूब कही
अभी चलता हूँ
साइकिल न सही
टाँगें तो हैं
घमण्ड न सही
हिम्मत तो है
और
चलने वाले कब
सवारी के मोहताज हैं हुए
किनारे बैठ कर कब
दरिया पार हैं हुए
और जो दम रखते हैं
वो अपने दम पर चलते हैं
मोटर गाड़ी साइकिल के कब
ग़ुलाम बनते हैं
और जब चलता हूँ खुद से बतियाने को
अपने अंदर की राह पाने को
उसी की तलाश में
फिर ये वक्त की पाबन्दी कैसी
समय का आडम्बर कैसा
और किस मुँह से कहूँ 
मैं व्यस्त हूँ
तुम्हारा दिया काम तो मुझसे किया ना गया

जी
मैं पैदल ही चला जाऊँगा
अब न कोई बहाना बनाऊँगा
चण्डीगढ़ सेक्टर 12 से
चपड़ चिड़ि का मैदान
कहाँ ज्यादा दूर है
और एक तरफ़ का 15 Km
आना-जाना 30 है
सीधा नाक की सीध है 
अब तो पैदल ही जाऊँगा
तभी बन्दे की 
वीरता पहचान पाऊँगा
इस यात्रा का क्या लिखूँ
क्या कहानी कहूँ 
और वृतांत लिख भी दूँ तो 
क्या मेरा औचित्य पूरा होगा 
बन्दा सिंह बहादुर के आगे 
मेरी कहानी का क्या महत्व होगा 
और क्यों कोई पढ़ना चाहेगा मुझे
जो मैंने वो लिखा ही नहीं 
जो सच इतिहासकारों ने मिटा दिया 
जो है मेरे दिल की आवाज़ 
उसे दबा कर रास्ते का 
वर्णण कर भी दूँ तो
फिर तो अपने मन की आवाज़
को मैंने दबा दिया
लिख दिया आज जो आया ज़ेहन में 
कलम के सब हिज़ाबों को मिटा दिया 
और पैदल 30 Km चला भी गया 
तो कौनसा मुकाम पा लिया
खैर
बीहड़ों में पैदल चलना फिर आसान है
क्योंकि वहां और कोई चारा नहीं
मुश्किल तो शहर है
शरीर चल है रहा 
मन है खड़ा
हर मोड़ पे ऑटोवाला पूछता है
कहाँ जाओगे
और मैं रहा स्तब्ध खड़ा

ओ बन्दे आ जाओ फिर से इस जहान में  
वज़ीर खान बन नशा हुक्म चला रहा 
और आज जनता आदि है हुई 
सुच्चानन्द ठहाका लगा रहा 
उसका भतीजा धर्म का चोगा पहना
कितनों के घर उजाड़ रहा

मेरे रहनुमा 
तेरी रज़ा में राज़ी मैं हुआ
क्या-क्या नहीं तूने मुझे दिखा दिया
धार्मिक तो वे थे जो इंसानियत के लिए सर कटा गए
आज फिर किसी ने धर्म के नाम पर दंगा करवा दिया






Saturday, 14 January 2017

अमृतसर से चण्डीगढ़ वापसी यात्रा (चण्डीगढ़-वाघा-चण्डीगढ़ साइकिल यात्रा अंतिम भाग-6)

निकलता हूँ यात्रा पर
तब एक लक्ष्य
सामने होता है
पाने को जिसको
निरंतर प्रयास होता है
वही दिखता है वैसे
अर्जुन को आँख जैसे
और उस तक पहुँचने को
उत्सुक ये मन होता है

अगर मैं कहूँ
की लक्ष्य ही प्रेरणा है
तो लक्ष्य पर पहुँच कर
लौट के आता कैसे
अगर मुसाफ़िर बन ये
कहूँ की चलना मेरा काम
तो फिर ये लक्ष्य कैसा
मेरे लिए तो हर जगह एकसमान जैसे

की क्या सीखा क्या देखा
क्या खोया क्या पाया
इस यात्रा से जीवन में
क्या बदलाव आया
यही सब सोचता हुआ
लौट आता हूँ
लक्ष्य पर पहुँच कर
माना कुछ देर ख़ुशी
का एहसास कर
भ्रमण विचरण कर
जब वापसी की राह
को देखता हूँ
फिर सोचता हूँ
भाई क्यों ये पंगा ले लिया ?
और बन हीरो
अब हो गई ना
सारी मोटीवेशन ज़ीरो
अब कैसे वापस जाएगा
कठिनाईयों से भरा रास्ता
कैसे काट पाएगा
और लक्ष्य को तो पा लिया
अब तो वापसी बाकी है
और जो है ली निगल
गले में फँसी वो लकड़ी बाकी है
और बन कछुआ
वो लकड़ी दबोच मैं लूँ
पर फिर भी संकोच में हूँ
की क्या करूँ क्या न करूँ
कैसे धीरज धरूँ
और अगर वो लकड़ी
दूँ मैं छोड़
फिर पंचतंत्र
तो सार्थक जाएगा हो
और ऐसा तो हर कोई सोचता है
की मैं तो अलग हूँ
मैं तो अलग हूँ सोचता
और मेरे साथ न होगा वो
जो सबके साथ है हुआ
और हो रहा
ये सोच तो शैतान की है
और यही कहूँगा की शैतान
लिहाज़ नहीं करता
बस एक गलत कदम और
वह आगोश में ले धरता
फिर रोएँगे माँ-बाप, भाई-बहन सब
यही सत्य है
और तुम
रखना भरोसा अपने रहनुमा पर
जो वो राह दिखाए उसी पे चलना
जिससे वो मिलाए उसी से तुम मिलना
जिससे वो बुलवाए उसी से बतियाना
और मेरा अनुभव तो यही है
यही है मेरा कहना
की जाना मुश्किल है और
बहुत मुश्किल
लौट के आना
इसलिए
संभल के तुम जाना
और उससे भी
संभल के लौट आना
की तुम नहीं जानते
जो बेवजह लड़ते भी हैं
वो हमसे कितना प्यार करते हैं

शाम के करीब 5 बज रहे होंगे | वाघा बॉर्डर से मैं अमृतसर की तरफ़ चल पड़ा | मैं पहले ही इरादा बना चुका था कि अमृतसर नहीं जाऊँगा | शहर के बाहर-बाहर से होते हुए जलंधर रोड़ तक आ गया | साइकिल चलता ही जा रहा हूँ, थकान की कोई सुध नहीं पर रात घिर आयी है और मैं ढूँढ रहा हूँ रात बिताने का कोई आशियाना | आखिरकार मैं सफ़ल हुआ और अमृतसर से लगभग 35 km बाहर एक ढाबे में कमरा ले लिया |

सुबह 5 बजे उठ गया और चल पड़ा चंडीगढ़ की ओर | ढाबे से ब्यास पहुँचा और वहां मिली दरिया के आस पास की धुंध जो कभी एक दम गहरी होती है और कभी एक दम पतली जैसे अँधेरे में किसी ने कोई तिलिस्म किया हो | वैसा ही तिलिस्म जैसा हम सब पे हुआ पड़ा है कि क्या सही क्या गलत हमें नज़र ही नहीं आता और हम सब जी रहे हैं दिखावे की ज़िन्दगी | जिसमें खुद को दूसरे से ऊँचा दिखाना ही हमारा लक्ष्य है |

यह धुंध हो जाती है गहरी
की मनो कह रही हो
मुझे पार करने की कैसी यह तुम्हारी रज़ा है
मैं तो बहुत बलवान हूँ कि कुछ न देखने दूँगी,
कि तुम हो उद्यमी तो तुम्हें खुद अपनी राह ढूँढ़नी होगी
और मैं इसके अंदर धीरज़ रख बढ़ता जाता तो ये
धुंध का गुबार पतला होता चला जाता
मानो मुझसे कह रहा हो कि लड़ोगे अगर
तो प्रकृति रास्ता भी देगी
लड़ना ही तो ज़िन्दगी है
ज़िंदादिली है
पर दिलोदिमाग को ठिकाने लगा के
तुम लड़ना, झूठी शान पर तुम न अकड़ना
प्रकृति भी माया उसी की सब जानती है उसी की तरह
समझो तो सही रहनुमा की गिरह

यह गिरह सुलझाते-सुलझाते कब ब्यास से करतारपुर तक का वो खतरनाक रास्ता पार कर गया पता ही नहीं चला |




करतारपुर में भोर हो गई है पर सूरज नहीं निकला | जलंधर जाकर कहीं सूर्यदेव के दर्शन हुए | जलंधर में चाय पी और जो कुछ खाने को मिला खाया (मट्ठी,बन,फैन ) जलंधर से फगवाड़ा और फगवाड़ा से नवांशहर रोड़ पे चलने लगा | अब मैं साइकिल चलाते हुए सोच रहा हूँ कि अगर मैं अकेला न आता तो मुझे बँटवारे के दर्द का एहसास कभी होता ही नहीं | मैं भी मशगूल रहता बातों में, हंसी मज़ाक में और इस दर्द का ख्याल ग़र आता भी तो मैं शायद इसे किनारे कर देता पुराने कपड़ों की तरह जो आपको पसंद तो बहुत हैं पर उनपे लगा वो दाग़ आपको अच्छा नहीं लगता |
शायद ये मेरे रहनुमा की मर्जी है, उसी का कोई इशारा है |



वापसी के समय जब आप वैसे ही थोड़े उदास होते हैं कि जिस लक्ष्य को पाने गए थे वह तो पा लिया अब बोरिंग वापसी बाकी है | अगर मोटरसाइकिल पे होते तो कान मरोड़ देते बाइक का, अगर कार में होते तो गाड़ी के पैर की छोटी ऊँगली दबा देते अपने पैर से और गाड़ी नॉनस्टॉप पहुँच जाती घर; लेकिन यह साइकिल है साहब ज़ोर माँगती है, थके हों या हों ऊर्जावान यह कहाँ फ़र्क पहचानती है | यह बस ज़ोर से चलती है और शरीर का ज़ोर माँगती है फिर भूखे हों या पेट भरे अंग्रेज़ी सरकार कि तरह कोई रहम नहीं करती तभी मुझे इसपे भरोसा है मोटर गाड़ी पे नहीं और यह तो इतनी हल्की है कि कंधे पे उठा के भी घूम सकता हूँ |

फगवाड़ा से नवांशहर-चंडीगढ़ की तरफ़ मुड़ गया | इस रास्ते पर आप जितना चाहें उतना तेज़ चल सकते हैं | ट्रैफिक कम है और अच्छी सड़क है | नवांशहर पहुँचते-पहुँचते भूख लग गई | आखिरी पेट भर कर खाना मनदीप के घर खाया था, यात्रा की पहली रात में, उसके बाद 14 केले खाये थे जालियांवलबाग के बाहर केले के ठेले पर जहाँ मैं अपनी साइकिल छोड़ गया था और ढाबे पर रात के खाने का पूछो मत, मंगवा तो ली पर खायी न गई तंदूरी लक्कड़ रोटी और फुलनमक दाल मखनी जिसको सूंघ कर मैं बता सकता था कि यह 4 दिन पुरानी थी | उस रोटी का अगर सुदर्शन चक्र बना ख़ानसामे की गर्दन पे मरता तो वो भी टूट जाती ! खैर यह अतिशयोक्ति हो गई पर वो रोटी चबाई ना गई थी |


नवांशह पहुँच कर एक कुलचे वाले के पास रुका | अक्सर कुलचे वालों के पास उबले आलू या उबले चने मिल जाते हैं और इस समय इन सबसे बेहतर क्या होता ?


देसी बन्दे की देसी खुराक; हाँ! यही कहा था उस कुलचे वाले ने |
उसके इस वाक्य के साथ हमारी उच्चस्तरीय बहुआयामी बातचीत शुरू हुई और हमने बातों ही बातों में इस देश की तमाम मुश्किलों का हल निकाल डाला | यह देश धन्य है जहाँ चाय वाला प्रधानमंत्री है, कुलचे वाला चाणक्य और एक बेरोज़गार इंजीनियर साइकिल पे घूम रहा है और वो वह सब सीखता है जो उसके प्रोफेसर ने कभी पढ़ाया ही नहीं!!! "ख़ालिस ज्ञान"| आज कुछ सीखने की नहीं सीखा हुआ भूलने की ज़रुरत है | हम साले सब कितने होशियार हो गए हैं, "Now it is time to unlearn and return Back To Basics".
यह मेरे नहीं कुलचे वाले के ख्याल हैं!!!
मैंने पूछा तो नहीं पर सोचता हूँ कहीं वो भी इंजीनियर तो नहीं था | ऐसे उच्चविचार तो बेरोज़गार इंजीनियर के ही हो सकते हैं !!!


बलाचौर ज्यादा दूर नहीं है यहाँ से बस चलते रहो और आप पहुँच जाओगे ठिकाने पर | बलाचौर से रोपड़ और वहाँ से कुराली और कुराली से न्यू चंडीगढ़ वाली रोड़ |


अभी दो बज रहे हैं, पहली जनवरी 2017 के और घंटे भर में मैं अपने कॉलेज पहुँच जाऊँगा | 30 दिसम्बर दोपहर 1 बजे शुरू की थी ये यात्रा और अब अंतिम पड़ाव में है, पर वो ख़ुशी पता नहीं कहाँ है जो इन हालातों में मैं महसूस करता हूँ | आज मैं ख़ुश नहीं और ये यात्रा मुझे कभी ख़ुशी दे भी न पाएगी | हाँ, मैंने जाना बँटवारे को, उसके दर्द को, वाघा की सरहद को और अपने संवेदनशील एहसास को | हे! मेरे रहनुमा उन सभी को मुक्ति दे जिनको चिता की आग और कब्र की मिट्टी तक नसीब न हुई | उन्हीं बेकसूर रूहों के नाम...........


अज आखाँ वारिस शाह नू कितों कबराँ विचों बोल
अज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल
इक रोई सी ती पंजाब दी वे तू लिख-लिख मारे वैण
अज लखां तीयाँ रोंदीयाँ तेनू वारिस शाह नू कैण
वे दर्दमंदा देया दर्दीया उठ तक अपना पंजाब
अज वेले लाशां बिछियाँ ते लहू दी भरी चेनाब
आज वारिस शाह को पूछती हूँ एक सवाल
कब्र से अपनी चाहे तुम जवाब बोलो
आज इश्क़ की किताब का अगला पन्ना खोलो
एक (हीर) पंजाब की बेटी जब थी रोई
लिख-लिख मारीं तुमने तोहमतें कसूरवारों की थू-थू थी होई
आज लाखों बेटियां हैं रोयीं पंजाब में
तुझसे कर रहीं सवाल जलीं जो बँटवारे की आग में
उठ दर्दमंदों के हमदर्द देख क्या हुआ आज पंजाब में
आज खेतों में लाशें हैं बिछी और लहू बहता चेनाब में
किसे ने पंजाँ पाणियाँ विच दित्ती ज़हर रला
ते ओहना पाणियाँ तरत नूँ दित्ता पाणी ला
इस ज़रख़ेज़ ज़मीं दे लूँ-लूँ फुटया ज़हर
गिठ-गिठ चड़ियाँ लालियाँ फुट-फुट चढ़या कैर
किसी ने पाँचों दरियाओं में घोल ज़हर दिया
और इनके ज़हरीले पानी ने धरती को सींच दिया
इस उपजाऊ धरती पर अंकुरित हो आया है ज़हर
खून से लाल हुई है यह और हर तरफ़ फूटा है कहर
विऊ वलिसी वा फिर बण-बण वग्गी जा
हर एक बाँस दी वंजली दित्ती नाग बणा
पहलाँ डंग मदारियाँ मन्तर गए ग्वाच
दूजे डंग दी लग्ग गई जणे खणे नू लाग
लागाँ किले लोक मुँह बस फिर डंग ही डंग
पलों-पले पंजाब दे नीले पे गए अंग
यह ज़हरीली हवा जो वन-वन में लगी चलने
हर बाँस की बाँसुरी लगी नाग बनने
सबसे पहले वो डसे जो जानते इसका इलाज
दूसरे डंग से तो सबके हुए यही मिज़ाज  
बढ़ते-बढ़ते इन नागों ने सबके होंठ लिए डंग
और अच्छे भले पंजाब के नीले पड़ गए अंग
गलयों टूटे गीत फिर तकलियों टूटी तंद
तरिन्जनो टुटियाँ सहेलियाँ चरखड़े घुकर बंद
सणे सेज़ दे बेड़ियाँ अज लुड्डण दित्ती ऱोड़
सणे डालियाँ पींघ अज पीपलाँ दित्ती तोड़
गले से गीत न निकला फिर तकली से धागा टूटा
सहेलियाँ बिछड़ गयीं और चरखा भी छूटा
मल्लाहों ने सारी किश्तियाँ बहा दी सेज़ के साथ
पीपल पे पड़ा झूला भी तोड़ा डाल के साथ
जित्थे वजदी फूँक प्यार दी ओ वँझली गई ग्वाच
राँझे दे सब वीर अज भुल गए उसदी जाँच
धरती ते लहू वस्या कबरां पइयाँ चोण
प्रीत दियाँ शहज़ादियाँ अज विच मज़ाराँ रोण
अज सब्बे कैदों बण गए हुसन इश्क़ दे चोर
अज कित्थों ल्याइए लब के वारिस शाह इक होर
अज आखाँ वारिस शाह नू कितों कबराँ विचों बोल
अज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल

ग़ुम हो गई वो बांसुरी जो बजती थी मार प्यार की फूँक
राँझे के भाई सब इसकी कला गए भूल
धरती पर बरसा लहू कब्रों में खून टपकने लगा
पंजाब की लड़कियाँ पर सारी विछोह का दर्द हावी हुआ
प्यार के चोर आज सभी औरतों के व्यापारी गए हैं बन
और कहाँ से ढूँढ़ के लाएँ आज वारिस शाह एक और हम
  
आज वारिस शाह को पूछती हूँ एक सवाल
कब्र से अपनी चाहे तुम जवाब बोलो
आज इश्क़ की किताब का अगला पन्ना खोलो  


(-अमृता प्रीतम)
(हिंदी अनुवाद मैंने खुद किया है | आपके सुझाव एवं सुधार सादर आमंत्रित हैं, भूल-चूक माफ़ कीजिएगा पर प्रकाश में ज़रूर लाईएगा |)



यात्रा विवरण 

पहला दिन

100 km - चंडीगढ़ से गढ़शंकर - 4:30 घण्टे----खर्च = ० रुपए

दूसरा दिन

140 km - गढ़शंकर से अमृतसर (वाया बंगा-जलंधर-ब्यास-अमृतसर-स्वर्ण मंदिर)- 7 घण्टे---- खर्च = 20 रुपए (चाय+मट्ठी)
34 km - अमृतसर से वाघा बॉर्डर- 1:30 घंटा----- खर्च = 50 रुपए (14 केले)
34 km -  वाघा बॉर्डर से अमृतसर वापसी- मैप नहीं बनाया ---खर्च = ० रुपए
48 km- अमृतसर से थोड़ा पीछे से ढाबे तक- 3 घण्टे ---- खर्च = कमरा 400 रुपए (न्यू ईयर करके महँगा मिला) + रात का खाना 100 रुपए (खाया नहीं गया) + पानी की बोतलें = 50 रुपए
कुल = 620 रुपए
दूसरे दिन की कुल दुरी = 140 + 34 + 34 + 47 = 255 km

तीसरा दिन

196 km - ढाबे से चंडीगढ़ (रइया-ब्यास-जालंधर-फगवाड़ा-नवांशहर-रोपड़-कुराली-चंडीगढ़)- 10:30 घण्टे --- खर्च = 20  (रुपए जालंधर में चाय,बन,मट्ठी) + 40 रुपए (कुलचे वाले के पास पेट भर के उबले आलू खाए)

यात्रा की कुल दूरी = 100 + 255 + 196 = 551 km
(अमृतसर में साइकिल स्टैंड की खोज में भटकना, शहर के अंदर ट्रैफिक से बचने के लिए साइकिल उठा कर तय की गई दूरी, पैदल तय किया गया रास्ता/भ्रमण शामिल नहीं)

कुल दूरी = 550 km
कुल समय = 50.5 घण्टे (30 दिसम्बर दोपहर 1 बजे से 1 जनवरी 2017 दोपहर 3:30 बजे तक
साइकिल चलाने का कुल समय = 28 घण्टे
कुल खर्च = 680 रुपए  














Wednesday, 11 January 2017

अमृतसर- वाघा बॉर्डर-अमृतसर (चण्डीगढ़-वाघा-चण्डीगढ़ साइकिल यात्रा भाग-5)

हो पेण्डे दूर पिशोराँ दे
हो पेण्डे दूर पिशोराँ दे
वाघे दे बॉर्डर ते
राह पुछदी लाहौराँ दे
(पेशावर का रास्ता बहुत दूर है और वाघा बॉर्डर पे लाहौर का रास्ता पूछना भी अब कहाँ तर्कसंगत है जब ये रास्ता अब रहा ही नहीं | )


सौदा नईं पुग्दा
हो सानु सौदा नईं पुग्दा
हो रावी तों चना पुछदा
की हाल है सतलुज दा
(हमें बँटवारा मंज़ूर नहीं ! रावी से चेनाब पूछ रहा है कि सतलुज का क्या हाल है ?)

31 दिसम्बर 2016 शाम 4 बजे

मैं एक बोर्ड़ के नीचे खड़ा हूँ, ऊपर लिखा है लाहौर 23 km | नया साल आने वाला है भीड़ बहुत है लेकिन मैं खड़ा हूँ एकाँत शून्य में | चलिए वक़्त में थोड़ा पीछे चलते हैं | सन 2012 एक गेरूएं रंग का शख़्स, लंबी दाड़ी वाला जो 25 kg का कलेजा रखता है, ट्रैकिंग में माहिर है, आग़ लिखता है; पूरा हिदुस्तानी | पैदल ही वाघा बॉर्डर पार करता है | उसकी पहली मंज़िल लाहौर है | जहाँ पहुँच कर वो पैदा होना चाहता है और देखना चाहता है वो देस जहाँ रावी बहती है, वो जगाहें जहाँ भारत की आज़ादी की तस्वीर गढ़ी गई | वो लाहौर पहुँचता है और शुरू से ही भगत सिंह को भगवान मानने वाला वो शख़्स आज उस लाहौर की जेल में जाना चाहता है जहाँ भगत सिंह जी को फाँसी हुई | तभी उसे एक ऑटोवाले की आवाज़ सुनाई देती है जो शायद जनता है कि, यह शख़्स यहाँ किस लिए खड़ा है | ऑटोवाला कहता है : "अगर भगत सिंह न होता तो कुछ भी न होता".......... 

चलिए थोड़ा और पीछे चलते हैं सन 2000-01 टीवी पर DD मेट्रो लगा है | माता पिता किसी पड़ोसी के घर के टीवी वाले हाऊसफुल कमरे की अपनी धुंधली यादों को खरोंच रहे हैं और तर्क हो रहा है कि बुनियाद के आज के एपिसोड में क्या होगा ? शायद आज मास्टर हवेली राम फिर से लौट के आने वाला है !!!

मेरे लिए तो यह सब नया है, शायद इन सब चीज़ों के बारे में मैंने पहले कभी नहीं सोचा और ये एकत्रित होती रहीं मेरे अचेतन मन में | ज़ल्द ही बाढ़ आने वाली है इन्हीं सभी भावनाओं की और यह शाँति भी, तूफ़ान से पहले के सन्नाटे से कम नहीं |

ऐसे ही ख़्याल चल रहे थे मेरे दिमाग में, जल्लियाँवाले बाग से वाघा बॉर्डर तक ऐसे ही ख़्यालों में खोया हुआ चला आया था मैं, अपनी साइकिल पर और बॉर्डर पर स्पीकर में बोला जा रहा है कि अंदर स्टेडियम भर गया है | बाकी लोग बाहर स्क्रीन पर परेड़ देखें | कुछ फोटो खींच मैं भीड़ को कोसता हुआ वापिस अपनी साइकिल के पास आ गया | कुछ स्थानीय लोगों से बातचीत की | बँटवारे की कहानियाँ जल्द ही मेरे ज़ेहन पर हावी होने लगीं | मैं वहाँ से भाग जाना चाहता हूँ, अतीत से और इंसानियत की उन सभी घिनौनी हरकतों से जो शायद मुझे भी हैवान न बना दें | ऐसी बर्बरता के किस्से की रूह काँप जाए | वापिस अमृतसर कि तरफ़ चलने लगा हूँ, तेज़ जितनी तेज़ मैं चला सकता हूँ ताकी पीछे छोड़ आऊँ इस ख़्यालों की भीड़ को जो दिलोदिमाग में घर कर गई है | मैं जल्द ही थक गया और बैठ गया एक मील के पत्थर के साथ साइकिल टिका के | इस मिट्टी में बैठते ही मुझे घेर लिया है उन सभी बेकसूर रूहों ने जो बँटवारे की भेंट चढ़ गयीं |


जो चित्र में है
वो एक झूठी हँसी है
उन सभी भावनाओं
को दबाने की कोशिश
जो जाग उठीं हैं
मैं जितने लोगों से मिला
सबने यही कहा

सच

जिसे सरहदें बाँध नहीं सकतीं
इस पार या उस पार
बॉर्डर महज़ एक तार
जिसको देख कर
लोग आज भी
यकीन नहीं करते
की उनका खेत
आधा बँट चुका है
आम आदमी बॉर्डर
नहीं पहचानता
दिल कहाँ ये
खींची हुई लकीरें मानता
मेरी तरह वो भी जाना
चाहता है उस पार
या उस पार का कोई
आना चाहता हो
इस पार
उनके लिए ये
एक कंटीली तार
जिसे वो चाह कर भी
पार नहीं कर सकते
इसके घुमावदार काँटों पर
उस वहशी वक़्त
के इश्तिहार लगे हैं
जब दरिया में खून बहता था
और जब कुओं में ज़हर घोला जाता था
दरींदगी का गन्दा खेल
न जाने गया कितनी बार खेला
भूख प्यास से बेहाल
कैसे चला लोगों का टोला
एक ऐसे वतन की ओर
जहाँ उनका कोई नहीं
आखिर क्यों ? क्या मिला है ?
दर्द के सिवा
कुछ भी नहीं

उस खौफ़नाक वक़्त में
दिल सिहर उठता होगा
वो चीखें
वो चिल्लाना
शायद किसी की
इंसानियत जाग जाए
पर तब इंसान कहाँ
हैवान घूमा करते थे
कितने कटे
कितने मरे
कितनियों के बलात्कार हुए
और कितनी बार हुए
कितनी बेटियों ने ज़हर खाया
कितने बापों ने खुद अपने
हाथों से अपने बीवी बच्चे काटे
दोस्तों ने कितने दोस्त काटे
ट्रेनों ने कितनी लाशें ढोईं
और किसने उन्हें जलाया/दफनाया
कितनों की लदी घोड़ियां
कोई और ले गए
कितनो के गड्डों(बैलगाड़ी)
के मालिक कोई और हो गए
कितने सब छोड़-छाड़ कर
बस दो कपड़ों में भागे
कितनी माँओं ने अपने
बच्चे अनाथ छोड़े वो अभागे
किसने कितने कत्ल किए
कौन कहाँ से आए
और कहाँ गए
कितनो को मार गए
कितनियों को उठा ले गए
कितने गुम हो गए
कैम्पों के रजिस्टरों में

कौन जिम्मेदार है ?
ऐ रहनुमा जो भी है
उसे तू माफ़ मत करना
उसे तू माफ़ मत करना
माफ़ मत करना
पता नहीं इंसानियत का
यह नंगा नाच
कितनी बार हुआ होगा
और कहाँ-कहाँ हुआ होगा
जितनी परतें आज खोलूंगा
शायद मेरे दिल का बोझ
उतना ही हल्का होगा
मैं तो बस सोना चाहता हूँ सकून से
सकून की नींद किसे पसंद नहीं
और जबसे ये सरहद है
वो सुकून किसी को मिला ही नहीं

कितना आसाँ है ज़माने को लड़ाना
बस एक अफ़वाह फैला दो
की तेरा धर्म ख़तरे में है
और कितना भटका हुआ है
यह ज़माना
भीड़ का एक हाथ जो शमशीर खींच रहा था
उसे दूसरा म्यान में वापिस दबा भी तो सकता था

पता नहीं मैं कितनी देर यहीं बैठा रहा | जकड़ा हुआ उन रूहों के हाथों में जो ये मिट्टी फाड़ कर मुझे झकज़ोर रहीं हैं | जब उठा तो टाँगें काँप रही थीं | अब वापिस नहीं जाऊँगा अमृतसर; मेरे से नहीं सहा जाएगा | इस शहर में जो हुआ, उसका एहसास सहा नहीं जाएगा फिर कभी आऊँगा मेरे दोस्त तेरी गलियों में, जहाँ मुझे वो बँटवारे की गूँज आज भी सुनाई दी | आज तू मुझे माफ़ करदे, इतना लाचार तो मैं कभी न था......... |


पंड चुक लई किताबां दी हो
पंड चुक ली किताबाँ दी
पुतराँ दे वैर न मुके
माँ मुक गई पंज-आबाँ दी
हो माँ मुक गई पंज-आबाँ दी
(हिन्दोस्तान-पाकिस्तान जो भारत माँ के बेटे थे उन्हें अँगरेज़ कागज़ पकड़ा गए, बँटवारे के और बेटों के वैर के बीच पाँच दरियाओं वाली हमारी माँ मर गई )

(सारे पंजाबी टप्पे - डॉ0 गुरदास मान)



Monday, 9 January 2017

जलियाँवाला बाग़ अमृतसर (चण्डीगढ़-वाघा-चण्डीगढ़ साइकिल यात्रा भाग-4)



एक ही नाम लिखा है
शहीद-ऐ-आज़म
राम मोहम्मद सिंह आज़ाद का
जिसका जिगरा था फौलाद का
गोली लगी हर ईंट पर
हर ज़र्रे पर
जलियांवाले बाग़ के

किताबों का झूठ
आज मेरे एहसास ने
नामंज़ूर कर दिया
सच जो देखा
जालियांवाले बाग़ का
जो एकता अंग्रेज़ों से
देखी न गई
फिर सहारा लेकर धर्म का
फूट हर सिम्त डाली गई
लिया बदला जिसने
इस क्रूर अत्याचार का 
एक ही नाम गूँज रहा ज़ेहन में
शहीद-ऐ-आज़म
राम मोहम्मद सिंह आज़ाद का
जिसका जिगरा था फौलाद का

21 साल का सब्र
किया अपनी प्रतिज्ञा पूरी करने को
देखो कितना धीरज धरा
लक्ष्य प्राप्त करने को

वो डायर जो कायर निकला
कर रहा तौहीन उसकी
शब्द हर मेरी बात का
आज चमक रहा
जो सूरज आज़ादी का
जो देखा हम सबने
संघर्ष भूला लेकिन
हर देशप्रेमी ज़ात का
वो आज़ादी के दीवाने
भी क्या खूब मतवाले थे
सूली चढ़े हंस कर सब
आज क्यों भूले हम उनको
और अर्थ
उनकी हर बात का


ऐ अंग्रेज़ो
बैसाखी के दिन
जो तुमने
कत्लेआम था किया
हैवानियत की हदों को
जो तुमने पार था किया
चलायी गोली तुमने निहत्थे लोगों पे
न जाने कितनी बार तुमने
इंसानियत को शर्मसार था किया

वो जन्मा नहीं कोख़ से
उसी बाग़ में था पैदा हुआ
जिस समय तुमने ये
हत्याकाण्ड था किया
तप उसने
21 साल तक था किया
फिर वर उसे मिला वो
जिससे राक्षस डायर का
संहार उसने था किया



की खड़ा हूँ आज
मैं उसी कौमी एकता की दीवार के सामने
छल्ली जिसका सीना
अंग्रेज़ी सरकार ने था किया
पर
सर ऊँचा है मेरा
की
जियो शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
हर भारतीय का सिर
ऊँचा उठा दिया
ग़र मिलती आज़ादी
और डायर जिन्दा रहता
कैसे मैं बात अपनी यह
फिर इतने फ़क्र से कहता
की तुमने हमारे कंधे से
तोहमत का भार उतार दिया
जिओ शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
देश का
गुलाम आत्मसम्मान जगा दिया
अपाहिज़ जो ज़ेहन था उसको
सशक्त बना दिया
जिओ शहीद-ऐ-आज़म उधम सिंह
की तुमने काम ऐसा किया
हर भारतीय का सिर
ऊँचा उठा दिया

क्या एक भी निशाँ मिला ?
गोली का
किसी की भी पीठ पर
तुमने गोली चलाई चुपके से
पर सामना छाती ने ही किया
तुम्हारी हर चाल का
और तुम कहते हो की गोरे पवित्र हैं
हर हिंदुस्तानी आज भी
गवाह तुम्हारे हर विश्वासघात का
समझ लेना ना नफ़रत का पुजारी
तुम मुझे
हर हिंदुस्तानी
दीवाना है इंसानियत ज़ात का
तभी ज़िंदा बच निकले तुम
सही सलामत बीवी बच्चों समेत
करुणा बस्ती यहाँ
दिल ये पाक-साफ़ इंसान का
द्वेष मेरे दिल में कोई
ये मत समझना
बदला ले रही कलम
उसी 200 साल का

की इंसानियत का मैं पुजारी
मेरा देश पुजारी
पर सवाल कर रही हर रूह वो
निवाला छीन कर खाया
जिस मज़बूर हर इंसान का
मैं नहीं जानता की
ख़ज़ाने कितने
तुम्हारे भर गए
चोंच से तिनका तक लूटा
चिड़िया-ए-हिन्दोस्तान का
और जो कुआँ था
बेकसूर लाशों से भर गया
उसका पानी आज भी
मीठा ही होगा
यह हर शब्द कहता
आज मेरी बात का
खून जो लावा बन
आज रागों में मेरी बह रहा
एहसानमंद हूँ उस
देशप्रेमी ज़ात का

मेरे रहनुमा मुझे इंसानियत
की हदों में रख
कोई धर्म का सौदागर
गलत मतलब ना निकल दे
मेरी किसी बात का




Saturday, 7 January 2017

स्वर्ण मंदिर अमृतसर (चण्डीगढ़-वाघा-चण्डीगढ़ साइकिल यात्रा भाग-3)



नाम हरिमंदिर
नींव रखी जिसकी
संत मियां मीर ने
है सिखों का तीर्थ
मेरे लिए तो
एकता का प्रतीक
जितनी बार टुटा
उतनी बार बना
है ज्ञान से भरा
वो सरोवर भी खूब
काग होते जहाँ हँस डूब-डूब
धार्मिक एकता का प्रतीक
वो ग्रन्थ जो यहाँ
रखा गया
जिसमें सार
सब मार्गों का
लिखा गया


वो पीले वस्त्रों
वाले किसी
साधू सा
जो है पवित्र
वक़्त के आदि सा
वो दीप्त जैसे
ज्योती दिए की
जिसमें है
मिश्रित तेल
हर धर्म का
जो ग्रन्थ वहां
जो है विराजा
है उसमें हर रूहानी फनकार
श्रेष्ठ ज्ञान ही जिसका आधार
हर धर्म का सार
उसमें गुरुओं ने है सहेजा

जैसे साधू कोई
गंगा में स्नान करता
पीले वस्त्रों में लिपटा
उसी साधू सा
यह प्रतीत होता
और रखा
नाम सरोवर पर 
इस शहर का
की अमृतसर है यह
नाम गुरुओं के धाम का
अती मनमोहक है यह
की मन मोह लेता
स्थान है यह
की धर्म मिलाप का

दस्तक दर पर और
सीढ़ियां ये जो
नीचे ले जाने लगीं
मिट्टी की खुशबू
मुझे आने लगी

स्वर्ण रंग में
स्वर्ण कांती में
स्वर्ण वस्त्र में
ये स्वर्ण मंदिर
सुशोभित हुआ


उसी एकीश्वर के हम बच्चे
मन के सब सच्चे
बस अकल के कच्चे
आ जाते हैं हम
बातों में
धर्म के सौदागरों की
जिन्हें न राह पता है
न थांव पता है
इस पिंजरे से आज़ादगी की
जो बैठे हैं सांप बनके
उनको दूध रहे हम पिला
और जब डसते हैं यें
कई पीढ़ीयां करते तबाह

हे! परमेश्वर इस देश को

Friday, 6 January 2017

चंडीगढ़ से वाघा बॉर्डर भाग-2 (गढ़शंकर से अमृतसर)

जी करता है

गर्मी बिस्तर की
समेट कर ले जाऊँ सारी
की रास्ते में दोस्त ठण्ड बहुत होगी

रात दोस्त के घर में
बिताई गढ़शंकर में
ये शहर भी है अलबेला
जन्माष्टमी के पास
लगता यहाँ राजा कंस का मेला
मामा की बात चली तो
एक यह भी रिवाज़-ए-ख़ास
बिजली गिरने के समय
मामा ना हो भांजे के पास 
क्योंकि गिरी जब शिला पे
तो वो बिजली बनी
और कंस था उसका मामा
तब से रीत यह चली

 
सुबह 5 बजे निकल पड़ा
मैं बंगा की ओर
अभी तो अँधेरा है घुप
सड़कें भी हैं चुप
कभी दिख जाती है
किसी गाडी की लौ
वैसे
दिखता नहीं
सड़क का दूसरा छोर
मुसाफिर चला है
फगवाड़ा की ओर

बंगा से फगवाड़ा
तेज़ हुआ जाड़ा
वो बिस्तर की गर्मी याद
आने लगी
लेकिन मैं भी हूँ खास
मेरा रहनुमा जो है साथ
बीरबल की खिचड़ी वो
आज पकने लगी
गुरद्वारों में है बोला
वो पाठी का राग
तेरी स्तुति का गान
सब करने लगे
मैं तो साइकिल पे हूँ चला
पापी भी हूँ बड़ा
फिर क्यों तेरे इशारे मुझे
समझ आने लगे
तू भी चालक है
खुश हूँ की
मेरे साथ है
बता देना मुझे
चुप-चाप मत बैठना
मेरी साइकिल का डण्डा
जब चुभने लगे
मैं रुक जाऊँगा
तेरे गुण गाऊँगा
रख दूंगा
माँ की चुनरी
जब डण्डा तुझे 
चुभने लगे
मेरे रहनुमा
बता क्या ये सही
मेरा फैसला
अकेला मैं आज चलने लगा
तू तो सब जनता
मैं तुझे मानता
फिर पेडल क्यों भारी
मुझे लगने लगा
जब हूँ सोचता
ज़माने को देखता
तेरी दया देखता
तेरी कायनात देखता
वो शक्ति में मैं
क्यों समाने लगा
मेरे रहनुमा
मुझे नहीं चला पता
मेरा पेडल कब हल्का
तूने कर दिया
सब है तेरी रज़ा
किसी को क्या है पता
पर तू सब जानता
दिल का राज़ पहचानता
तेरी रज़ा में मैं
राज़ी होने लगा
मेरे रहनुमा करना
सबका भला
सभी का भला


रौशनी बढ़ने लगी
और क्षितिज़ पर दिखी
पहली किरण
क्या खूब हुआ आज 
आसमान से धरती का मिलन
वाह क्या नज़ारा है
कुदरत का अदभुत
खेल सारा है
बस आप सही जगह हों सही समय
फिर जगह चाहे आम हो
नज़ारा होगा विस्मय
मैं तो यही हूँ मानता
जैसे समयानुसार है राग गया जाता
हर नज़ारे का है सही समय आता
बस आप सही जगह हों सही समय
बाकी तो सब किस्मत का खेल है
सब सही समय का मेल है


पहुँचा चलते-चलते मैं
शाहजहां के फगवाड़े में
भाई तुमने तो बाज़ार बसाया था
अब तो गांव बस गया
जो व्यापारी था कभी
अब वो भी
किसान बन गया
किल्ला (ज़मीन) बेच के 
विदेश जो चला जाता है 
वो जट्ट अब
गाना गाता है 
खैर अब तो ये सच में
फगू का बाड़ा है
जो बाहर से है मीठा
और अंदर से खारा है


जलंधर मैं पहुँचा
देश के एक सबसे
पुराने शहर में
पंजाब की पुरानी राजधानी
त्रिगर्त की राजधानी
लव की राजधानी में 
एक राक्षस पर या
हुआ जब ये जलमग्न
सतलुज ब्यास में

जलंधर नाम है इसका
ये हड़प्पा के काल का


जलंधर से ब्यास तक भाई
साइकिल वालों की शामत आई
पुल तंग हैं कोई रेलिंग नहीं
मिट्टी पड़ी है किनारे पर
साइकिल चलाने की कोई
जगह ही नहीं
किए होंगे जो पाप
तो यहाँ बुरा हाल होगा
सच्चे बन्दे का यहाँ
रहनुमा सहारा होगा
मैं तो बच निकला
बस नाम उसका लेकर
चलना संभल कर
साइकिल हाथ में लेकर
चौड़ी सड़क चाहिए
तो अभी
तंग रास्ते पे चलो
पैदल चलने की जगह
भी नहीं जहाँ
वहां भाग कर चलो
पीछे से जब ट्रक आता है
अपने आप
थका हुआ कदम भी उठ जाता है
जान तो सबको प्यारी है


दरिया-ए-ब्यास
जो आया मेरे घर से
की लौटा सिकंदर जहाँ से
वो पोरस के डर से
ब्यास आज लेकिन
कितनी उदास है
सरहदों से पंजाब
हुआ दोआब है
ब्यास के पार
बारी दोआब है

चुप-चाप बह रहा है 
आज ब्यास  है उदास
पता नहीं क्यों ? 
बंटवारे से तो सब नफ़रत करते हैं
फिर हुआ क्यों ? 

पहुँचा मैं ब्यास
हुआ रहनुमा का एहसास
ये जगह भी तो है ख़ास
यहाँ संतो का वास
ज्ञान जो समझते
सब छुपा है हुआ
यहाँ भी रखा है
समेटा हुआ
आओ तुम कभी
डेरे पर जो जाओ
कुछ आलोकिक ज्ञान
तुम भी समेट लाओ


कुछ और आगे
राइया नाम की जगह आयी
यहाँ पी सुबह की चाय
और मट्ठी खाई
चाय वाला विजय दोस्त बना लिया 
और कुछ थकान मिटाई

सूरज अब तो देखो कैसे
चमक रहा
गर्मी ये सर्द धरती में
ये भर रहा
उतार दिए मोटे कपड़े
की अब सर्दी नहीं
और याद गर्म बिस्तर की
अब आती नहीं 
आराम भी सबको प्यारा है 


यहाँ से अमृतसर 40 km दूर
दो घंटे में यह सफ़र तय किया
शहर में दाखिल होते ही
ट्रैफिक मिली भरपूर



भाई बहुत भीड़ है की
नया साल है
जूता तक उतर गया 
वो भी चार बार 
ईतना बुरा हाल है
तिल फेंकने की जगह नहीं
और तू साइकिल पे सवार है ?
गालियाँ ये बुज़ुर्गों सी हैं 
जो सब सहती हैं 
उठा ले साइकिल कंधे पर 
और चल पैदल नंगे पाँव  
टोह कर तो देख 
आखिर ये क्या कहती हैं ?
शायद 
वो अमृता, वो फैज़,
वो खुशवंत, वो मंटो 
इन्ही के एहसास 
कहती हैं

   
10 फुट की गली
और 103 वाहन हैं
कई रांझे बीच में
माजियां (भैंसे) चरावण हैं
पुरानी इन गलियों पर
नए पुराने
दोनों का बोझ है
भीड़ है बहुत की
नया साल है
अमृतसर में ट्रैफिक का

Wednesday, 4 January 2017

चंडीगढ़ से वाघा बॉर्डर भाग 1


कुदरत-ए-हस्ती
हक़ गिरेबान की खोज में
आज चला हूँ
अपने आप की खोज में
मंज़िल क्या है मेरी
क्या मेरा वज़ूद है
इस धरती में मेरा क्या
काम मौज़ूद है
कहाँ वो बाग़-ए-बहिश्त
कहाँ असल दर-ए-रसूल है 
मंज़िल क्या है मेरी
क्या मेरा वज़ूद है

आज चला हूँ
सब दरकिनार कर
बंद कर उधेड़ बुन
बस अपने असल मन  की सुन
जो राह-ए-दर-ए-असल है
राह वो चुन
जो है मौज़ूद हर मंज़िल-ए-राह में
उसी के हुक्म की आहट सुन
जो रहनुमा है सबका
उसका कहना सुन
आज तो उसकी
राह ली है चुन

आज चला हूँ
तेरे भरोसे पर
मंज़िल दूर है
मेहनत भरपूर है
तेरे दर पर तो बस
मेहनत का नूर है
कर बख़्श मुझे तू
मेहनत का रास्ता
आज तो तुझे
तेरी रहनुमाई का वास्ता
है मुश्किल ये राह
तो मुश्किल ही सही
इलावा इसके कोई रज़ा ही नहीं

ऐ रहनुमा तू मुझे हर शह परख
वो अज़मत-ऐ-मेहनत
मेरी नज़र कर
जो बहता मेरी रगों में
उस लहू को अबशार कर
मेरी नज़र-ऐ-अजनबी को
तू पाक-साफ कर
कर दे तू मुश्किल
मेरी मुश्किल को और भी
आज़माने चला हूँ अपनी
मज़बूती-ऐ-ज़ोर भी
मेरे दम को तू
और मज़बूत कर
मेरे रहनुमा
तू मुझे मेहनत अता कर

चला हूँ आज
चंडीगढ़ से वाघा की राह पर
दोपहर 1 बजे निकला
मंज़िल की राह पर
आज का मुकाम
100 km दूर है
इस सर्द दोपहर में
बिखरा रहनुमा का नूर है

चण्डीगढ़ से चला गढ़शंकर की ओर
पकड़ वही पामाल रास्ता 
वही पुरानी ठौर 
साइकिल भी चलती मानो अकड़
चलाओ जितनी भी तेज़ 
ज़ोर लगाओ बेधड़क

                                             ये 
खेत-खलियानों के नज़ारे 
तो देखो 
गुड़-शक्कर की ये दुकाने 
तो देखो
देखो की कैसे देश तरक्की करता है 
गाड़ी का टोल कैसे कटता है 


टोल से आगे फिर शहर कुराली आता   
गुड़, मूंगफली, गन्ना और सूरजमुखी 
के लिए जाना जाता   


कुराली से मुड़ा फिर मैं रोपड़ की ओर
सिंधुघाटी सभ्यता की ये पुरानी ठौर 
बसा सतलुज किनारे
ये शहर ऐतिहासिक
शिवालिक के पैरों की दलदल
जो है संरक्षित 
सड़क किनारे दिख जाते हैं यहाँ मोर 
रोपड़ से चला मैं बलाचौर की ओर 
सतलुज के उस पार
ब्यास के इस पार
पड़ता है बिस्त दोआब   


बलाचौर में बंद इक टोल है आता 
अक्सर रुक जाता है 
यहाँ से मुसाफिर आता-जाता 
पीता हूँ गन्ने का रस और लंगर हूँ छकता
और गुणगान उस रहनुमा का करता 
जो सबके लिए सब इंतज़ाम करता 
समझो तो सही उसके इशारे 
वही खोलेगा छुपे भेद सारे 



बलाचौर से गढ़शंकर की ओर चला
देखते ही देखते दिन भी ढला
अब मुसाफिर आज के पड़ाव की ओर चला 
पड़ाव तो है ये सीधे रस्ते से थोड़ा हट के 
लेकिन विश्राम भी तो करना है 
कब तक सड़कों पे यूँ भटकें
आज रुकूँगा अपने मित्र के पास 
है तो भाई बड़ा ही खास
तभी आ गया सीधा रास्ता छोड़ 
उसके पास 


इक्कट्ठे लूटे थे किसी समय 
वो चण्डीगढ़ के नज़ारे
आते हैं सामने अब वो 
बीते लम्हे सारे 
वो रातों को आखिरी शो की फिल्में 
वो सारी
कभी तो पैदल कभी ऑटो की सवारी 
वो पीजी वाली ऑन्टी के नख़रे वो सारे 
पकड़ो मनदीप को मेरे पैसे उसने हैं मारे 
वो यादें पुरानी सारी
जो आँखों के सामने चलीं 
खोया हुआ मैं उनमें
चेहरे पर मुस्कराहट खिली 
वक़्त की तेज़ मझधार में
ये किस्से पुराने पुल से 
धुंधली होती यादें 
किस्से ये ऊषा से
ज़िन्दगी ग़र है तो 
कुछ खट्टे-मीठे किस्से 
सीख लो कुछ 
बस तुम इनसे 

सोच-सोच में डूबा
पहुँचा मैं मनदीप के घर पे 
100 km चलने में
लगे 4:30 घण्टे
और वो यार फिर दिलदार सा मिला 
फिर पुरानी यादों का सिलसिला चला 
चाय के दौर के बाद
खाना दिया खिला 
फिर तो मैं घोड़े बेच कर सो ही गया 


कल पहुंचूंगा वाघा
जो अभी 180 km दूर है
मेरे रहनुमा 
कितना हसीं तेरी कायनात का नूर है 
बस बना रहना मेरा हमसफ़र 
हम फिर रहे सब हैं भटके
सही राह तू दिखा   
हमसफ़र तू सबका 
सही राह तू दिखा